सोचता हूं ।

     

भगवान्  श्रीकृष्ण ने समझाते हुए कहा कि भारत! तेरे और मेरे इस जन्म से पहले अनेक जन्म हो चुके हैं लेकिन जिन्हें तू नहीं जानता और मैं उन्हें जानता हूं। मेरे जन्म तो दिव्य होते हैं अर्थात् मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरुप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति (माया)को अधीन करके  अपनी योगमाया से सबके सामने प्रकट (दृश्य) होता हूं और अन्य मनुष्य/प्राणी तो त्रिगुणी प्रकृति/माया के अधीन हो कर अपनी माता के गर्भ से उत्पन्न होते हैं। अर्जुन जब-जब धर्म/पुण्य की हानि/कमी होती है और अधर्म/पाप/अत्याचार बढ़ता है। चारों तरफ समाज में अच्छाई कराहती है बुराई

 खिलखिलाती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात् साकार रूप से/

देहधारी सबके सामने प्रकट होता हूं।संत/

साधु/सज्जन/अच्छे पुरुषों का कल्याण 

करने केलिए,दुष्ट/दुर्जन/पापियों का संहार 

करने केलिए और धर्म/पुण्य को सुव्यवस्थित करने केलिए मैं युग-युग/

समय-समय में प्रकट हुआ करता हूं।–

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्यतदात्मानंसृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनांविनाशायचदुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थ संभवामियुगेयुगे‌।।–

गीता, अध्याय ४, श्लोक ७-८

                प्रस्तुतकर्ता 

     डॉक्टर हनुमान प्रसाद चौबे 

                 गोरखपुर।

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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