सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
*पेरिस, जिसे सब प्रेम की नगरी मानते हैं, क्या वह सच में ऐसी है? आइए, इसे जापान के लोगों से जानते हैं।*
कहते हैं, जापान में पेरिस को फिल्म, साहित्य और मीडिया के माध्यम से एक आदर्श शहर के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। इसी कारण जापानी पर्यटक पेरिस को देखने के लिए बहुत उत्सुक रहते थे। उनके लिए पेरिस एक अत्यधिक रोमांटिक और खूबसूरत शहर था।
लेकिन जब उन्होंने सच में पेरिस का सामना किया, तो उन्हें वहाँ भीड़-भाड़, गंदगी और असभ्य व्यवहार जैसी असलियत देखने को मिली। यह उनके लिए बड़ा झटका था। कई जापानी पर्यटकों को तो पहली बार पेरिस देखकर सांस्कृतिक सदमा लगा और उन्होंने महसूस किया कि यह शहर उतना भी सुंदर या आकर्षक नहीं है, जितनी उन्होंने उम्मीद की थी। यह सदमा कई बार तो इतना बड़ा होता था कि जापानियों को वापिस जाकर मनोवैज्ञानिक सलाह की आवश्यकता पड़ती थी। इस मानसिक भ्रम की स्थिति को अब जापान में *'पेरिस सिंड्रोम'* के नाम से जाना जाता है।
गौर करें, यह 'पेरिस सिंड्रोम' हम सभी की इस संसार को लेकर भ्रम की स्थिति को ही तो दर्शा रहा है। हमें भी लगता है कि यह भौतिक दुनिया बहुत सुंदर है। इस संसार के ऐशो-आराम, आकर्षक वस्तुएँ, रिश्ते-नाते हमें अत्यधिक लुभावने और प्रिय लगते हैं।
किंतु जब कठिन समय में इनमें से कुछ भी काम नहीं आता या अंत समय में कुछ भी साथ नहीं जाता, तब हम इनकी वास्तविकता से परिचित होते हैं। यह छलावा हमें निराश कर देता है। या कहें एक गहरा सदमा देता है।
इसलिए आवश्यक है कि हम इस *'संसार सिंड्रोम'* की गिरफ्त में न फँसें। समय रहते, एक ऐसे पूर्ण गुरु को खोजें, जो हमें भीतर की वास्तविक सुंदर नगरी में ले जाएँ। हमारे अंतर्घट की दुनिया का दर्शन करवाएँ। वो दुनिया, जिसके सम्पर्क में आने से हमारे यहाँ के काम भी सँवरते हैं; हमारा अंत भी सँवरता है; और आगे की यात्रा भी सँवर जाती है।
*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*
*श्री सियाबिहारी जी*✍️
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