भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा —अर्जुन!इस संसार में बिना मनसा/वाचा/कर्मणा कर्म किए कोई भी व्यक्ति क्षण मात्र भी नहीं रहता क्योंकि प्रकृति/स्वभाव कर्म करने केलिए प्राणी को मजबूर करती है और अर्जुन!बिना कर्म (खाना,चलना, बोलना,
लिखना, देखना, सोचना आदि)किए प्राणी का शरीरभीकायम नहींरहसकता।
लेकिन कुछ लोग कर्म केवलअपने लिए ही करते हैं, कुछ लोग अपने और दूसरों के लिए भी तथा कुछ लोग केवल आत्मशुद्धि हेतु और लोकहित के लिए ही करते हैं। लेकिन कर्म करते हुए भी कर्म के फल/परिणाम (अच्छी -बुरीयोनियों में जन्म, निश्चित आयु और अच्छे -बुरे भोग ) से बचने केलिए कर्म करने में कुशलता/
चतुरता यह है कि शास्त्र सम्मत/कर्तव्य कर्म को उसके सिद्ध होने या न होने में समान भाव से,कर्म के फल की इच्छा छोड़ कर तथाआसक्ति का त्याग कर, किया जाय, क्योंकि वह कर्म करणीय , कर्त्तव्य और शास्त्रीय है।
अर्जुन! जो बिना इच्छा के अपने आप मिले हुए पदार्थ में सदा प्रसन्न रहता है, जो ईर्ष्या रहित है और जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से रहित है –ऐसा सिद्धिऔर असिद्धि में समान भाव रखने वाला पुरुष कर्म करता हुआ भी उन कर्म-फलों से नहीं बंधता –
यदृच्छालाभसंंतुष्टोद्वन्द्वातीतोविमत्सर:।
सम:सिद्धावसिद्धौ चकृत्वापिननिबध्यते।।
–गीता, अध्याय ४,श्लोक २२
प्रस्तुतकर्ता
डॉक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
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