*मन को ही मंदिर बना लो*

          सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

ईश्वर को ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है।

लोग मंदिर-मस्जिद, तीर्थ-व्रत में ईश्वर को ढूंढते हैं, पर संत कहते हैं - *ईश्वर सबसे पास है, तुम्हारी अपनी साँसों में।*

भगवान ने ये शरीर ही मंदिर बनाया है।

> *"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे वन माहि।*

> *ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं।।"*

जैसे हिरण की नाभि में ही कस्तूरी होती है, पर वो उसे पूरे जंगल में ढूंढता फिरता है, वैसे ही हम भी हैं।

*कबीर दास जी की वाणी*-

*पानी बीच मीन प्यासी,    मोहित सुनी - सुनीआवत हंसी*।                                                                                      *आत्मज्ञान बिना नर भटके  कोई  मथुरा कोई काशी।।*

जैसे पानी से घिरी हुई मछली पानी की महत्व को नहीं जानती है। वैसे ही मनुष्य सत्य के बीच घिरा हुआ है लेकिन ईश्वर को बाहर ढूंढ रहा है।

*क्या करना है?*

 पूर्ण गुरु के सानिध्य (शरण) में जाकर ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेकर रोज ध्यान साधना करनी चाहिए। धीरे-धीरे मन शांत होने लगेगा, और उसी शांति में परमात्मा की झलक मिलेगी।

जब मन शांत है, तो हर दिन सोमवार है, हर दिन मंगल है।

*मन जीता, तो जग जीता।*

*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*

श्री सियाबिहारी जी ✍️

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


Post a Comment

Previous Post Next Post