सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
महाराज दशरथ के पास सब कुछ था - धन था, वैभव था, विशाल साम्राज्य था, तीन-तीन रानियाँ थीं। पर एक कमी थी जो उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। पुत्र-रत्न नहीं था।
एक दिन यह ग्लानि इतनी बढ़ गई कि वे स्वयं को रोक नहीं पाए। मन दुःखी हुआ तो किसकी याद आई?
अपने रिश्तेदारों की? अपनी रानियों की? नहीं।
उन्हें याद आई अपने गुरु, गुरु वशिष्ठ जी की।
*गुर गृह गयउ तुरत महिपाला।*
*चरन लागि करि बिनय बिसाला।।*
वे सीधे गुरु के आश्रम की ओर चल पड़े।
महाराज दशरथ चाहते तो बड़े-बड़े ज्योतिषाचार्यों को, सिद्ध-योगियों को बुलवा सकते थे। बड़ी-बड़ी पूजा, बड़े अनुष्ठान करवा सकते थे। पर वे इस गूढ़ तथ्य को जानते थे।
यही तथ्य दिव्य गुरुदेव *श्री आशुतोष महाराज जी* ने अपने एक शिष्य को बड़े स्पष्ट शब्दों में समझाया था। अपने श्रीचरणों की ओर इशारा करके कहा था -
*"स्मरण रहे, जो मिलेगा यहीं से मिलेगा। जो यहाँ नहीं मिला, तो कहीं से नहीं मिलेगा। यदि मिल भी गया, तो वह उपयोगी नहीं होगा।"*
यही गुरु-भक्तों के लिए प्रथम सूत्र है।
जब भी गत कर्मों के कारण जीवन में दुःख आए, तो भागना है - पर बाहर के संबंधों की ओर नहीं। भागना है आत्मा के चिरसंगी गुरु की ओर।
दुःख सुनाना ही है तो उसे सुनाओ, जो सुनकर उसे मिटा सके। वहाँ नहीं, जहाँ रोते को और रुलाया जाता हो।
महाराज दशरथ ने अपना दुःख गुरु वशिष्ठ को सुनाया तो परिणाम क्या हुआ?
*निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ।*
*धरहु धीर होइहहिं सुत चारी।*
गुरु ने एक नहीं, चार-चार पुत्र होने का वर दे दिया। और पुत्र के रूप में मिले भी तो कौन? स्वयं जगतनियन्ता भगवान श्री राम!
यही तो है गुरु का सामर्थ्य। वो रीझ जाएँ तो भगवान को भी सहजता से झोली में डाल देते हैं।
इसलिए ऐसे सर्वसामर्थ्यवान गुरु को छोड़कर और कौन है जो हमें कुछ दे सकता है? मूढ़ हैं वे लोग जो ऐसे पूर्ण गुरु को तजकर इधर-उधर पीरों-फकीरों के दर पर माथा रगड़ते फिरते हैं।
*सार यही है - सुख में, दुःख में, हर घड़ी गुरु के चरणों को ही अपना ठिकाना बनाओ। वही तुम्हें वो देगा जो दुनिया की कोई ताकत नहीं दे सकती।*
*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*
श्री सियाबिहारी जी ✍️
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