**गुरु भक्ति योग कथामृत**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी। 

गुरु जीवन नौका के कर्णधार हैं और ईश्वर उस नौका को चलाने वाले अनुकूल पवन हैं। जब मनुष्य को संसार के प्रति घृणा उपजती है उसे वैराग्य आता है और गुरु के दिए हुए उपदेशों का चिंतन करने के लिए शक्तिमान होता है। तब ध्यान का बराबर अभ्यास करने के कारण उसके मन की अनिष्ट प्रकृति दूर होती है। 

   गुरु से भली प्रकार जान लिया जाए, तभी मंत्र के द्वारा शुद्धि पैदा होती है। मनुष्य अनादि काल से अज्ञान के प्रभाव में होने के कारण गुरु की सहायता के बिना आत्म-साक्षात्कार नहीं कर सकता। जो ब्रह्म को जानता है वह ही दूसरे को ब्रह्मज्ञान दे सकता है। सयाने मनुष्य को चाहिए कि वह अपने गुरु को आत्म-परमात्म रूप जानकर अविरक्त भक्तिभाव-पूर्वक उनकी पूजा करे अर्थात उनके साथ तदाकार बने। 

     शिष्य को गुरु एवं ईश्वर के प्रति सन्निष्ट भक्तिभाव होना चाहिए। शिष्य को आज्ञाकारी बनकर सावधान मन से एवं निष्ठापूर्वक गुरु की सेवा करनी चाहिए।  उनसे भगवत-भक्त के कर्तव्य अथवा भगवत-धर्म जानना चाहिए। शिष्य को ईश्वर के रूप में गुरु की सेवा करनी चाहिए, विश्व के नाथ को प्रसन्न करने एवं उनकी कृपा के योग्य बनने का यह सुनिश्चित उपाय है। शिष्य को वैराग्य का अभ्यास करना चाहिए और अपने अध्यात्मिक गुरु का सत्संग करना चाहिए। 

   मानव जीवन एक अवसर है अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का। और हमारा लक्ष्य है ईश्वर को जानना और जानकर उनको पाने के रास्ते पर चलना। अगर हम ऐसा करते हैं तो ठीक है। नहीं तो फिर से 84 लाख के निम्न योनियों में जाने के लिए मजबूर होते हैं।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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