*वह एकाक्षरी मंत्र क्या है, जिसे खुद पार्वती जी ने शिव जी से पूछा था?*

           सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा 

पुराणों में कथा आती है - एक बार देवी पार्वती भगवान शिव से जिज्ञासा करती हैं - *'भगवन, कृपा कर मुझे एकाक्षरी मंत्र का रहस्य बताइए।'*

तब महादेव उत्तर देते हैं -

> *एकाक्षरस्य मंत्रस्य कवचं देवी दुर्लभम्।*

> *यो धारयेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते॥*

> *गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम्।*

*अर्थ -* हे देवी! यह एकाक्षर मंत्र कवच रूप है, अर्थात् महारक्षक है तथा अति दुर्लभ है। इसे धारण करने वाले के जीवन में कभी विघ्न नहीं व्यापते और उसे सर्वसिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

माँ पार्वती फिर पूछती हैं - *'परन्तु भगवन! इस मंत्र को कहाँ से अथवा किसके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है?'*

महादेव कहते हैं - *'दातव्यं भक्ति युक्ताय गुरुदेव पराय च...'* अर्थात् जो सज्जन भक्तियुक्त होकर सद्गुरु के परायण हो जाता है, उसे ही वे ब्रह्मज्ञान प्रदाता गुरुदेव यह मंत्र प्रदान करते हैं।

*तो वास्तव में यह एकाक्षर है क्या?*

यह महिमावान एकाक्षर *हिन्दी वर्णमाला का कोई 'स्वर' या 'व्यंजन' नहीं है।* इसे वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।

यह तो वही *आदिनाम है, परम शब्द, Word है,* जो सृष्टि के आदिकाल में भी था। इसी आदिनाम से सृष्टि का विस्तार हुआ और यही हमारे प्राणों को संचालित कर रहा है।

*एकाक्षर = 'एक' + 'अक्षर',* यानि वह 'एक' सत्ता, जो 'अ' + 'क्षर' है, जिसका कभी क्षरण नहीं होता। सारांशतः एकाक्षर, उस 'एक अविनाशी', 'एक अनश्वर' सत्ता को ही कहा गया।

सद्गुरु अपनी महती कृपा से (हमारे कानों में कोई स्वर नहीं डालते, अपितु) ब्रह्मज्ञान प्रदान कर इसी अविनाशी ब्रह्म को या आदिनाम रूप तरंग को हमारे भीतर प्रकट कर देते हैं।

और इस अलौकिक ब्रह्मज्ञान की साधना के फलस्वरूप ही साधक में श्री गणेश का प्राकट्य होता है - अर्थात उसके जीवन के सारे विघ्न समाप्त हो जाते हैं।

*सार क्या निकला?*

1. यह मंत्र किताब से नहीं मिलता, दुकान से नहीं मिलता।

2. यह कानों से सुनने वाला मंत्र नहीं, भीतर अनुभव करने वाला नाद है।

3. यह केवल भक्तियुक्त शिष्य को, ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु द्वारा ही प्राप्त होता है।

इसीलिए इसे *'दुर्लभम्'* और *'गणेशहृदयं'* कहा गया है।

*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*

*श्री सियाबिहारी जी* ✍️

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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