*माँ का तीसरा रूप - माँ चंद्रघंटा*

           सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

> *पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।*

> *प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥*

तीसरे नवरात्रे में माँ के इसी रूप की पूजा होती है। माँ के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्ध-चन्द्रमा विराजमान है, जिसके कारण इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। इनके घंटे की भयानक ध्वनि से दुष्ट और नकारात्मक शक्तियाँ तुरंत नष्ट हो जाती हैं।

*माँ की दस भुजाओं का रहस्य -*

माँ के चंद्रघंटा स्वरूप में *दस भुजाएँ हैं, जो हमारी पाँच कर्म-इन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों की प्रतीक हैं।* 

माँ के इस रूप से हमें *जितेन्द्रिय* होने की शिक्षा मिलती है। जो मानव इन दस इन्द्रियों के अधीन है, वह सदैव बंधन में, दुख में जीवन व्यतीत करता है।

इसीलिए माँ भगवती हम मुमुक्षुओं (मुक्ति चाहने वालों) को अपना असली स्वरूप बताते हुए कहती हैं -

> *रूपं मे निष्कलं सूक्ष्मं वाचातीतं सुनिर्मलम्।*

> *निर्गुणं परमं ज्योतिः सर्वव्याप्येककारणम्॥*

*सरल अर्थ -* हे जीवों! मेरी इस दस भुजा वाली मूर्ति में मत उलझो। देह के बंधन से मुक्ति पाने के लिए मेरे उस रूप का ध्यान करो जो निष्कल है, सूक्ष्म है, वाणी से परे है, अत्यंत निर्मल है, जो निर्गुण परम ज्योति है और सभी जगह व्याप्त है।

और वो ज्योति-स्वरूप कहीं बाहर नहीं, तुम्हारे अपने भीतर ही है, जो *ब्रह्मज्ञान द्वारा ही अंतर्जगत में प्रकट होता है।*

*सार -*

माँ कह रही हैं - बेटा, इन्द्रियों पर काबू पाओ, घंटा बजाकर अपने भीतर की नकारात्मकता को भगाओ, और मेरे असली ज्योति-स्वरूप को अपने अंदर पहचानो।

*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*

श्री सियाबिहारी जी ✍️

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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