*आप कैसा कर्म करते हैं?*

   सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा  वर्षा

*श्रीमद्भगवद् गीता - अध्याय 18, श्लोक 23,24,25*

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने 3 प्रकार के कर्म बताए है। *१.तामसिक कर्म - सबसे निकृष्ट*

> *अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।*

> *मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ (18/25)*

*अर्थ -* बिना सोचे-समझे, परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी क्षमता को देखे बिना, केवल मोह और मूर्खतावश किया गया कर्म तामसिक कहलाता है।

*2. राजसिक कर्म - अहंकार वाला कर्म*

> *यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।*

> *क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥ (18/24)*

*अर्थ -* जो कर्म बहुत मेहनत और दौड़-धूप से, फल की लालच और "मैं कर रहा हूँ" के अहंकार से किया जाता है, वो राजसिक कर्म है। इसमें इंसान दिन-रात सिर्फ अपनी इच्छाओं के लिए भागता रहता है।

*3. सात्त्विक कर्म - सबसे श्रेष्ठ*

> *नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।*

> *अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ (18/23)*

*अर्थ -* जो कर्म शास्त्र और नियम के अनुसार है, जो किसी को उलझाता नहीं, जो बिना राग-द्वेष और बिना फल की इच्छा के किया जाता है, वही सात्त्विक कर्म है।

*सार -* इसलिए हमेशा अपना कर्म सात्त्विक रखिए, वही ईश्वर को प्रिय है।

*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*

श्री सियाबिहारी जी ✍️

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।

Post a Comment

Previous Post Next Post