*गीता का सार - कर्म करो, फल की चिंता मत करो*

            सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

 तो अब आपको करना क्या है?

बस गीता के इस एक उपदेश को अपने जीवन में उतार लेना है - *"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"*

अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने तक है। फल की व्यवस्था तो पहले से ही निश्चित हो चुकी है।

*इसलिए आपका काम है -*

ईमानदारी से मेहनत करना, सीखते चलना, गिरो तो फिर उठ जाना, और सतत आगे बढ़ते रहना। विवेकपूर्वक, होश के साथ अपने कर्म में लगे रहना।

फल कैसे आएगा, कब आएगा, इसकी चिंता करना आपका काम नहीं है।

*एक बहुत सुंदर सत्य समझिए -*

जो आपके लिए ईश्वर ने विशेष रूप से बनाया है, वह कभी बहेगा नहीं, खोएगा नहीं, और आप तक पहुँचे बिना रुकेगा नहीं।

जिस तरह चींटी का दाना समय पर उस तक पहुँच जाता है,

और समुद्र के बीच व्हेल के बच्चे का दूध समुद्र में भी नहीं बिखरता,

उसी तरह जो आपके भाग्य में है, वह भी आप तक पहुँचने का रास्ता खोज ही लेगा।

जिस ईश्वर ने छोटे से छोटे जीव के लिए भी प्रबंध किया है, जिसने समुद्र की अथाह गहराइयों में भी जीवन को पोषित किया है, वही आपके जीवन को भी संभाल रहा है।

*इसलिए निश्चिंत रहिए।*

आपको आपका भाग अवश्य प्राप्त होगा।

शायद उस रूप में नहीं जैसा आप सोचते हैं, बल्कि उस रूप में जैसा भगवान ने आपके लिए सोच रखा है और जिसकी आपको सच में आवश्यकता है।

*ॐ श्री आशुतोषाय नमः*

*श्री सियाबिहारी जी ✍️*

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार या उनके द्वारा संकलित है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।



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