सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।
जगत् आत्मा से अलग नहीं है।
लेकिन शिष्य पूछता है--
"यदि जगत् आत्मा से अलग नहीं है, तो फिर मुझे जगत् आत्मा से अलग क्यों दिखाई देता है?"
यही तो हमारी सामान्य अनुभूति है।
मैं यहाँ हूँ।
संसार मेरे सामने है।
पेड़ अलग है।
मनुष्य अलग है।
घर अलग है।
आकाश अलग है।
मैं और संसार अलग-अलग दिखाई देते हैं।
तो फिर अद्वैत कैसे सत्य है?
अष्टावक्र इसका उत्तर देते हैं--
अज्ञान के कारण।
रज्जु–सर्प का प्रसिद्ध दृष्टान्त
मान लीजिए संध्या के समय रास्ते में एक रस्सी पड़ी है।
अंधेरा है।
आपको वह ठीक से दिखाई नहीं देती।
आपको लगता है—
"साँप!"
आपका शरीर डर जाता है।
हृदय तेजी से धड़कता है।
आप पीछे हट जाते हैं।
अब किसी ने प्रकाश किया।
आपने ध्यान से देखा—
"अरे! साँप था ही नहीं, रस्सी थी।"
अब प्रश्न है—
साँप कहाँ गया?
क्या असली साँप वहाँ था और फिर भाग गया?
नहीं।
क्या रस्सी मरकर साँप से रस्सी बन गई?
नहीं।
वास्तव में—
साँप कभी था ही नहीं।
वहाँ केवल रस्सी थी।
फिर साँप दिखाई क्यों दिया?
क्योंकि—
रस्सी का सही ज्ञान नहीं था।
अज्ञान था।
अंधकार था।
और उस अज्ञान के कारण रस्सी पर सर्प की कल्पना हो गई।
यही अष्टावक्र का मुख्य सिद्धान्त है।
> अज्ञान से अधिष्ठान पर एक दूसरा रूप दिखाई देता है।
रज्जु थी।लेकिन सर्प दिखाई दिया।
आत्मा है।लेकिन आत्मा के अज्ञान में जगत् स्वतंत्र और अलग दिखाई देता है।
"आत्मा के अज्ञान के कारण जगत् भासता है।"
इसका अर्थ यह नहीं कि पहाड़, पेड़ और मनुष्य बिल्कुल आँखों के सामने दिखाई ही नहीं देते।
व्यवहार में वे दिखाई देते हैं।
लेकिन अज्ञान के कारण हम उन्हें—
आत्मा से स्वतंत्र, अपने-आप में पूर्ण और अंतिम सत्य मान लेते हैं।
यही समस्या है।
आत्मज्ञान होने पर क्या होता है?
यहाँ बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है।
अष्टावक्र यह नहीं कह रहे कि आत्मज्ञान होते ही—
"पेड़ गायब हो जाएँगे, लोग गायब हो जाएँगे और संसार समाप्त हो जाएगा।"
यदि ऐसा होता, तो आत्मज्ञान कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं बल्कि एक बहुत विचित्र जादुई घटना होती।
यहाँ नष्ट होता हैजगत् का स्वतंत्र, आत्मा से अलग होने का भ्रम। दृश्य रह सकता है।
व्यवहार रह सकता है।
लेकिन उसकी स्वतंत्र सत्ता का आग्रह समाप्त हो जाता है।
रस्सी का ज्ञान होने पर सर्प कहाँ जाता है?
रस्सी का ज्ञान होने के बाद आप रस्सी को देखते हैं।
सर्प का भय समाप्त हो जाता है।
सर्प के लिए कोई अलग से जाकर उसे भगाने की आवश्यकता नहीं।
क्यों?
क्योंकि सर्प था ही नहीं।
ठीक इसी प्रकार आत्मज्ञान में—
अज्ञानजनित द्वैत-बुद्धि का निवारण होता है।
किसी बाहरी वस्तु को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं।
यही कारण है कि ज्ञान "नया कुछ पैदा" नहीं करता
यह अद्वैत वेदान्त की एक बहुत सुंदर बात है।
आत्मज्ञान आपको कोई नया आत्मा नहीं देता।
आपको कोई नया स्वरूप प्राप्त नहीं करना।
आप पहले से ही चैतन्य हैं।
समस्या यह है कि आपने अपने वास्तविक स्वरूप को शरीर, मन और अहंकार के साथ मिला दिया है।
जैसे रस्सी को साँप समझने से रस्सी साँप नहीं बन गई थी।
उसी प्रकार—
अज्ञान से आत्मा जीव नहीं बन जाती।
केवल जीवभाव की प्रतीति होती है।
अज्ञान में तीन स्तर की भूल-
इसे थोड़ा और गहराई से समझें।
पहली भूल—"मैं शरीर हूँ।"
दूसरी—
"यह जगत् मुझसे अलग स्वतंत्र सत्य है।"
तीसरी—
"इस जगत् में प्राप्त वस्तुओं से ही मेरा सुख और दुःख निर्धारित होगा।"
इन तीनों का मूल है—
अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान।
आत्मज्ञान इस मूल को पकड़ता है।
"अहं" और "जगत्" दोनों का सम्बन्ध--
ध्यान दें— अब तक जनक ने बार-बार कहा है—
मैं शुद्ध बोध हूँ।
यदि मैं शुद्ध बोध हूँ, तो शरीर भी उसी में ज्ञात है।
मन भी उसी में ज्ञात है।
जगत् भी उसी में ज्ञात है।
इसलिए "मैं" और "जगत्" का जो कठोर विभाजन दिखाई देता है, वह अंतिम सत्य नहीं हो सकता।
स्वप्न का उदाहरण--
रज्जु–सर्प के अलावा स्वप्न भी बहुत उपयोगी उदाहरण है।
स्वप्न में आपको एक पूरा संसार दिखाई देता है।
आप स्वयं भी उसमें एक व्यक्ति होते हैं।
आपको वहाँ सुख-दुःख वास्तविक लगता है।
फिर नींद खुलती है।
आप समझते हैं—
"वह सब स्वप्न था।"
स्वप्न के दौरान अनुभव झूठा नहीं था— आपने वास्तव में अनुभव किया।
लेकिन उसकी स्वतंत्र वस्तुगत सत्ता नहीं थी।
अद्वैत इसी प्रकार जाग्रत जगत् की स्वतंत्र सत्ता पर प्रश्न करता है।
क्या इसका मतलब जीवन को गंभीरता से न लें?
नहीं।
यह बहुत सामान्य गलतफहमी है।
"जगत् मिथ्या है" सुनकर कोई कह सकता है—
"फिर कुछ भी करो, कोई फर्क नहीं पड़ता।"
अष्टावक्र का उद्देश्य ऐसा नैतिक शून्यवाद पैदा करना नहीं है।
जब तक व्यवहारिक जगत् का अनुभव है, तब तक व्यवहार के नियम भी हैं।
भूख लगे तो भोजन करना पड़ेगा।
किसी को चोट पहुँचाना वास्तविक दुःख उत्पन्न करता है।
कर्तव्य और करुणा का अपना व्यवहारिक महत्त्व है।
ज्ञान का अर्थ लापरवाही नहीं।
ज्ञान का अर्थ है—
व्यवहार करते हुए भी भीतर वास्तविक स्वरूप को न भूलना।
आत्मज्ञान का वास्तविक फल--
रस्सी को रस्सी जान लेने के बाद—
भय समाप्त।
आत्मा को आत्मा जान लेने के बाद—
मूल मोह समाप्त।
फिर व्यक्ति समझता है—
मैं शरीर के अनुभवों का साक्षी हूँ।
मैं मन के उतार-चढ़ाव का साक्षी हूँ।
मैं सुख-दुःख का साक्षी हूँ।
मैं जगत् की प्रतीति का भी साक्षी हूँ।
और मेरा वास्तविक स्वरूप इन सबके आने-जाने से नहीं बदलता।
जब मन में कोई बहुत बड़ा भय उठे, तुरंत उसे दबाने की कोशिश न करें।
पहले देखें—
"जिस वस्तु से मैं डर रहा हूँ, उसकी मेरी धारणा क्या है?"
फिर देखें—
"क्या मैं उसे ठीक उसी रूप में जानता हूँ, या मन ने उसके ऊपर कुछ जोड़ दिया है?"
फिर इससे भी गहरा प्रश्न—
"जो इस भय को जान रहा है, क्या वह स्वयं भय है?"
यहीं साक्षी की ओर ध्यान जाता है।
रज्जु–सर्प दृष्टान्त हमें यह नहीं सिखाता कि—"संसार को झूठ बोलकर नकार दो।"
यह सिखाता है—
"जो जैसा है, उसे वैसा ही जानो।"
रस्सी को साँप मत समझो।
शरीर को आत्मा मत समझो।
मन को आत्मा मत समझो।
परिवर्तनशील को नित्य मत समझो।
दृश्य को द्रष्टा मत समझो।
और जगत् को आत्मा से स्वतंत्र सत्ता मत समझो।
यही विवेक है।
उपसंहार--
> "अज्ञान में आत्मा पर जगत् की स्वतंत्र सत्ता का आरोप होता है; ज्ञान में यह आरोप मिट जाता है और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में पहचानी जाती है।"
रस्सी को साँप समझना अज्ञान है।
रस्सी को रस्सी जानना ज्ञान है।
उसी प्रकार—
अपने को शरीर-मन मानना अज्ञान है।
अपने को शुद्ध चैतन्य जानना आत्मज्ञान है।
और आत्मज्ञान का अर्थ संसार को मिटाना नहीं है।
संसार के पीछे छिपे उस अधिष्ठान को पहचानना है, जिसके बिना संसार का अनुभव ही संभव नहीं।
यही कारण है कि अष्टावक्र बार-बार बाहर की वस्तुओं को बदलने के बजाय दृष्टि और ज्ञान को बदलने की बात कर रहे हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
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