कठोपनिषद् — आत्मा सूक्ष्म भी है और विराट भी।

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी। 

जिसे बाहर खोजने पर कोई सीमा नहीं मिलती, उसे भीतर खोजने पर भी कोई आकार नहीं मिलता; क्योंकि आत्मा वस्तु नहीं, स्वयं अस्तित्व का आधार है।"

आत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि या बहुत-सा शास्त्र सुन लेने से उपलब्ध नहीं होती। आत्मज्ञान तब प्रकट होता है जब साधक की दृष्टि भीतर मुड़ती है और अज्ञान का आवरण हटता है।
अब यमराज आत्मा के स्वरूप को एक अत्यंत विलक्षण उपमा से समझाते हैं—
"इस जीव की हृदय-गुहा में स्थित आत्मा अणु से भी अणु और महान् से भी महान् है। जो संकल्प-विकल्प और कामनाओं से मुक्त होकर अंतःकरण की निर्मलता प्राप्त करता है, वह शोक से रहित होकर आत्मा की महिमा को देखता है।"
यह मंत्र आत्मा के संबंध में हमारी सामान्य धारणाओं को एक साथ तोड़ देता है।
"अणोरणीयान् — अणु से भी सूक्ष्म"
हम किसी वस्तु को सूक्ष्म कहते हैं तो उसका अर्थ होता है—छोटी वस्तु।
लेकिन आत्मा को छोटा कहना उचित नहीं।
यदि आत्मा किसी आकार की छोटी वस्तु होती, तो वह भी किसी स्थान में सीमित होती।
फिर वह अनन्त कैसे हो सकती?
इसलिए यहाँ "अणोरणीयान्" का अर्थ भौतिक आकार से नहीं है।
आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि उसे इन्द्रियाँ पकड़ नहीं सकतीं।
मन उसे वस्तु की तरह पकड़ नहीं सकता।
बुद्धि उसे किसी सीमित परिभाषा में बाँध
"महतो महीयान् — महान् से भी महान्"
और उसी आत्मा को कहा गया—
महतो महीयान्।
महान् से भी महान्।
यहाँ एक अद्भुत विरोधाभास दिखाई देता है।
एक ही आत्मा—
अणु से सूक्ष्म भी और विराट से विराट भी।
कैसे?
क्योंकि आत्मा किसी वस्तु का आकार नहीं है।
वह चेतना है जिसमें सूक्ष्म और विशाल—दोनों का ज्ञान होता है।
आकाश विशाल है।
लेकिन आकाश का भी ज्ञान किसे है?
वह चेतना उससे भी किसी अर्थ में "परे" है।
"एक सरल उदाहरण"
मान लीजिए आपके सामने एक विशाल पर्वत है।
आप उसे देखते हैं।
फिर एक छोटी-सी चींटी देखते हैं।
पर्वत बड़ा है।
चींटी छोटी।
लेकिन दोनों के होने का ज्ञान किसे है?
आपको।
आपकी चेतना पर्वत के आकार की नहीं हो जाती।
पर्वत को देखने के लिए चेतना विशाल नहीं बनती।
चींटी को देखने के लिए चेतना छोटी नहीं होती।
वह दोनों को प्रकाशित करती है।
इसी प्रकार आत्मा वस्तुओं के आकार के अनुसार बदलती नहीं।
"अब मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण संकेत—"
आत्मा कहाँ है?
यमराज कहते हैं—
"गुहायाम्।"
गुहा में।
यहाँ गुहा का अर्थ पत्थर की कोई गुफा नहीं है।
यहाँ संकेत है—
हृदय-गुहा।
अर्थात् मनुष्य के भीतर का अत्यंत सूक्ष्म आंतरिक क्षेत्र।
यह वही "भीतर" है जिसकी ओर पूरी कठोपनिषद् हमें मोड़ रही है
"हृदय-गुहा का अर्थ क्या है?"
यहाँ "हृदय" को केवल शरीर के रक्त पंप करने वाले अंग के रूप में नहीं समझना चाहिए।
उपनिषदों में हृदय अक्सर अंतःकरण और चेतना के केंद्र का द्योतक है।
जब हम कहते हैं—
मेरे भीतर कुछ कह रहा है।
या
"मैं भीतर से जानता हूँ।"
तो हम किसी भौतिक स्थान की बात नहीं कर रहे।
हम उस आंतरिक चेतना की ओर संकेत कर रहे हैं जिसमें अनुभव, विचार और आत्मबोध संभव होते हैं।
"तमक्रतुः पश्यति — कौन देखता है?"
अब एक अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है—

अक्रतुः।

अर्थात् जिसका अंतःकरण संकल्पों और कामनाओं की निरंतर दौड़ से मुक्त हो गया है।

यहाँ फिर वही बात लौटती है जो हमने रथरूपक में देखी थी।

यदि मन निरंतर इच्छाओं में उलझा है—

तो भीतर की सूक्ष्म वास्तविकता को देखना कठिन है।

मन बाहर दौड़ रहा है।

एक इच्छा से दूसरी इच्छा।

एक चिंता से दूसरी चिंता।

एक स्मृति से दूसरी स्मृति।

ऐसे मन में आत्मविचार कहाँ टिकेगा?

इसलिए—

मन की शुद्धि आत्मज्ञान की भूमि है।

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"वीतशोकः — शोक से परे"

जिसने आत्मा को जाना, वह—

वीतशोक होता है।

अर्थात् शोक से परे।

इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी के जीवन में कभी कोई दुखद परिस्थिति नहीं आती।

शरीर को पीड़ा हो सकती है।

प्रिय व्यक्ति का वियोग हो सकता है।

परिस्थितियाँ बदल सकती हैं।

लेकिन ज्ञानी का मूल आत्मबोध इन परिवर्तनों से नहीं टूटता।

क्योंकि उसने अपने को केवल परिवर्तनशील उपाधियों तक सीमित नहीं माना।

> "आत्मज्ञान दुःख को जीवन से मिटाने का वादा नहीं करता; वह दुःख के बीच भी अपने वास्तविक स्वरूप को न खोने की दृष्टि देता है।"


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"धातुप्रसादात् — अंतःकरण की निर्मलता"

यहाँ एक और महत्वपूर्ण शब्द है—

प्रसाद।

लेकिन इसका अर्थ केवल किसी देवता की कृपा से प्राप्त प्रसाद नहीं।

यहाँ अंतःकरण की प्रसन्नता और निर्मलता का संकेत है।

जब मन—

अत्यधिक वासनाओं से मुक्त हो,

द्वेष से हल्का हो,

लोभ से मुक्त हो,

अहंकार की पकड़ ढीली हो,

और बुद्धि विवेकपूर्ण हो,

तब अंतःकरण निर्मल होता है।

ऐसे निर्मल अंतःकरण में आत्मज्ञान सहजता से प्रतिबिंबित होता है।
"अब तक की पूरी साधना यहाँ जुड़ जाती है"
देखिए, कठोपनिषद् कितनी सुंदर क्रमबद्ध शिक्षा दे रहा है—
श्रेय को चुनो।
प्रेय के आकर्षण को पहचानो।
इन्द्रियों को संयमित करो।
मन को नियंत्रित करो।
बुद्धि को विवेकपूर्ण बनाओ।
अंतःकरण को निर्मल करो।
हृदय-गुहा में स्थित आत्मा को पहचानो।
यह अचानक प्राप्त होने वाला कोई रहस्यमय अनुभव नहीं।
यह दृष्टि की परिष्कृति है।
"आज के मनुष्य के लिए इसका महत्व"
हम बाहर की दुनिया को समझने में बहुत आगे बढ़ गए हैं।
हमने अंतरिक्ष को खोजा।
समुद्र की गहराइयों को खोजा।
सूक्ष्म कणों को खोजा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाई।
लेकिन एक प्रश्न अभी भी उतना ही पुराना ह

> "जिस चेतना से मैं इन सबको जान रहा हूँ, उसे मैं कितना जानता हूँ?"

कठोपनिषद् हमें बाहर की खोज रोकने को नहीं कहता।
वह केवल कहता है—
बाहर की खोज के साथ भीतर की खोज भी आवश्यक है।
"आत्मा को देखने का अर्थ"
यहाँ "पश्यति" शब्द आया है—
देखता है।
लेकिन आत्मा आँखों से दिखाई देने वाली वस्तु नहीं।
इसलिए यह "देखना" है—
स्वरूप का साक्षात्कार।
जैसे जागने पर व्यक्ति यह नहीं कहता कि—
"मैंने जागरण को देखा।"
वह स्वयं जागृत होता है।
इसी प्रकार आत्मज्ञान में आत्मा कोई बाहरी दृश्य नहीं बनती।
ज्ञाता अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होता है।
"एक बहुत गहरी बात"
आत्मा को जानने के लिए कहीं जाना नहीं है।
क्योंकि यदि आत्मा से दूर जाना संभव होता, तो आत्मा अनन्त नहीं होती।
इसलिए यात्रा वास्तव में दूरी की यात्रा नहीं है।
यह—
अज्ञान से ज्ञान की यात्रा है।
गलत पहचान से सही पहचान की यात्रा है।
बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की यात्रा है।
और अंततः—
जीवभाव से आत्मभाव की यात्रा है।
  "लेख का सार"
अणोरणीयान् — आत्मा इन्द्रियों की पकड़ से परे सूक्ष्म है।
महतो महीयान् — वह किसी सीमा में बँधी नहीं, इसलिए अनन्त है।
गुहायाम् निहितः — उसका बोध भीतर ही संभव है।
अक्रतुः — कामनाओं से मुक्त अंतःकरण उसे पहचानने योग्य होता है।
वीतशोकः — आत्मबोध शोक के मूल अज्ञान को समाप्त करता है।
धातुप्रसादः — निर्मल अंतःकरण आत्मज्ञान की भूमि है।

> "जिसे तुम संसार में खोज रहे हो, उसका प्रकाश तुम्हारे भीतर पहले से उपस्थित है। बाहर की वस्तुओं को जानने वाला मन जब स्वयं को जानने के लिए भीतर लौटता है, वहीं आत्मविद्या का आरम्भ होता है।"

ओम् श्रीआशुतोषायनम:

"श्री रमेश जी"

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार या उनके द्वारा संकलित है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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