मशरुम की खेती या मशरुम फार्मिंग करने के लिए विभिन्न जानकारियां जैसे मशरुम कैसे उगाये जाते हैं, कब उगाये जाते हैं, मशरुम के लिए कम्पोस्ट कैसे तैयार की जाती है और सबसे बड़ी बात इन्हें उगाने के लिए कैसे वातावरण एवं इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है, इत्यादि जानकारी होना अति आवश्यक है | जिसके पास उपर्युक्त जानकारी है तो वह व्यक्ति या महिला मशरुम फार्मिंग बिज़नेस स्टार्ट कर सकते हैं
मशरूम उगाने की बिधि
गर्म पानी द्वारा : इस विधि में 10 किलो पैरा कुट्टी या गेहूँ के भूसे (1-2 इंच के टुकड़े) को 100 लीटर पानी में 14-16 घण्टे डुबाकर रखते है जिससे माध्यम नरम हो जाता है जिससे माध्यम नरम हो जाता हैं। पश्चात पानी निथार देते है तथा 2 बाल्टी गर्म खौलता हुआ पानी गीले माध्यम में डालते है। एक घण्टे के बाद पानी निकाल देते है। माध्यम को छायादार साफ जगह पर एक परत में फैला देते है जिससे माध्यम में अतिरिक्त नमी निकाल जाय। जब माध्यम को मुट्ठी में दबाने से पानी न निकले तथा हथेली भी गीली न हो अर्थात माध्यम में 68-72 प्रतिशत नमी हो, तब यह मशरूम बीज मिलाने हेतु उपयुक्त होता है। रासायनिक विधि द्वारा : इस विधि में 100 लीटर पानी में 125 मी.ली. फ़ार्मेलिन तथा 7.5 ग्राम बाविस्टीन मिलाकर घोल बनाते है, तत्पश्चात 10 किलो माध्यम (भूसे) को अच्छी तरह से घोल में 14-16 घण्टे के लिये डूबा देते है, बर्तन के मुँह को पालीथिन से ढँक देते है। अब इस गीले हुए माध्यम से घोल निथार देते है तथा उसे पक्के ढालू फर्श पर बिछा देते है ताकि घोल अच्छे से निथर जाये। ध्यान रहे कि भूसा इतना सूखा होना चाहिए कि हाथ से दबाने पर पानी न निकले। इस गीले भूसे का वजन सूखे भूसे की तुलना में तीन फीसदी ज्यादा होना चाहिए। 6-बीजाई आयस्टर मशरूम उत्पादन के लिये उपयुक्त माध्यम (गेहूँ का भूसा या पैरा कुट्टी) का चयन कर उसमें मशरूम बीज मिलाते है। माध्यम में मशरूम बीज (स्पान) विभिन्न विधियों द्वारा मिश्रित किया जाता है। स्वस्थ बीज देखने में एकदम सफ़ेद, ताजा, सम्पूर्ण दानों को ढँका हुआ, अच्छी किस्म का, अधिक उत्पादन क्षमता वाला होना चाहिये। ताजा बीज सदैव अधिक उपज देता है। बीज मिश्रण 3 प्रतिशत या 30 ग्राम बीज प्रति किलो गीला माध्यम की दर से किया जाता है। बोतल से बीज को निकालने के लिए बोतल को अच्छी तरह से हिलाना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर चम्मच या तार के टुकड़े का प्रयोग किया जा सकता है। बीज को जीवाणुविहीन पैराकुट्टी में साफ-सुथरे स्थान में या पालीथिन शीट पर अच्छे से मिलाया जाता है। मिलाने के पश्चात उपरोक्त आकार की थैलियों में भरकर ऊपर से मुँह बंद कर देते है। थैलियों के आकार का मशरूम उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है, जो वि.वि. की मशरूम अनुसंधान प्रयोगशाला में किये प्रयोग से स्पष्ट है। मध्यम आकार की थैलियों (18"X12") में उत्पादन अधिक होता है तथा बड़े आकार (20"X16") एवं छोटे आकार (12"X8") की थैलियों में तुलनात्मक दृष्टि से मशरूम उत्पादन कम पाया गया है। ध्यान रहे थैली का एक चौथाई भाग खाली रहे। थैली के मुँह को रस्सी से बाँध दें और थैले में चारों तरफ सलाई से छेड़ कर दें ताकि थैले के अंदर हवा प्रवेश कर सके। झोपड़ी की व्यवस्था झोपड़ी में लकड़ियों के बत्ते से रेक तैयार किये जाते है और इन्ही के माध्यम से थैलियों को लटकाया जाता है। झोपड़ी मिट्टी की, घास-फूस या पत्तियों की तथा पक्की बनी हो सकती है। इसमें सूर्य का प्रकाश अंदर नहीं आना चाहिए परंतु वायु का पर्याप्त आदान-प्रदान होना चाहिए। झोपड़ी में नमी होना अत्यंत आवश्यक है। यह 80-90 प्रतिशत के मध्य होना चाहिये। नमी कम होने की उपस्थिति में पानी का छिडकाव दोहराया जा सकता है। अधिक तापक्रम होने की स्थिति में पानी का छिडकाव जमीन पर व थैलियों पर स्प्रेयर के द्वारा किया जा सकता है। झोपड़ी के अंदर तापक्रम 20-28 डिग्री से.ग्रे. होना चाहिए। आयस्टर मशरूम की वृद्धि के लिये दिन में 15 मिनट के लिये प्रकाश का आना पर्याप्त होता है। कार्बन डाई-आक्साइड की मात्रा झोपड़ी में मशरूम फफूंद के कवकजाल फैलते समय अधिक व खाने योग्य मशरूम निकलते समय कम होना चाहिये। गरम हवा को पंखे द्वारा बाहर निकालने का प्रबंध करना चाहिये। वैसे घास-फूस की बनी झोपड़ी में इस तरह की समस्या नहीं होती है कीटों से बचाव के लिये मशरूम घर में प्रति सप्ताह एक बार नुवान दावा का 0.1 प्रतिशत की दर से (1 मी.ली./लीटर पानी में) फर्श एवं दीवारों पर छिडकाव करना चाहिये। मशरूम घर की प्रतिदिन देखभाल करें। रोग एवं कीट आदि प्रकट होने पर तुरंत उनके नियंत्रण का उपाय करें। मशरूम की स्वछता पर विशेष ध्यान दें। मशरूम को तोड़ते समय मास्क का प्रयोग करें ताकि मशरूम के बीज श्वांस के द्वारा शरीर में प्रवेश न कर सके। 15-20 दिन पश्चात कवक की पैरा कुट्टी में वृद्धि से पूरा थैला सफ़ेद दूधिया रंग का दिखाई देने लगता है, तब थैली को पूर्ण रूप से हटा दें या लम्बाई में थैली को काट दें। इस वक्त दो थैलों के बीच का अंतर 10-12 इंच होना चाहिए। देखभाल एवं तुड़ाई अनुकूल स्थिति में थैलों को काटने के 5-6 दिन बाद से ही मशरूम का सिर (पिन हैड) दिखाई पड़ने लगता है जो 3-4 दिन बाद आकार में बढ़कर 5-10 से.मी. का हो जाता है। जब मशरूम उपयुक्त आकार के हो जाये, तब इनकी तुड़ाई करना आवश्यक है। इस स्थिति में ये किनारों से ऊपर की ओर मुड़ने लगते है। तुड़ाई करते समय यह सावधानी बरतें की छोटे बढ़ रहे मशरूम को हानी न पहुँचे। इस प्रकार एक थैले से 3-4 बार तुड़ाई की जा सकती है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में लगभग 2 माह का समय लगता है। जो इस बात का प्रतीक है कि पैरा को हटाने का समय आ गया है। प्रयोग किए गए पैरा को न फेंकें क्योंकि यह खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। तुड़ाई के पश्चात 8-10 घण्टे के अंदर मशरूम का उपयोग कर लेना चाहिए अन्यथा इसे पालिथीन कि थैली या बाँस कि टोकरी में भरकर रेफ्रीजरेटर में 6-7 दिन तक रखा जा सकता है। मशरूम का अधिक उत्पादन होने पर अनेक संरक्षण विधियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। मशरूम फसल प्रबंधन आयस्टर मशरूम उत्पादन करते समय निर्जीवीकृत माध्यम में उपयुक्त नमी की अवस्था (68-70 प्रतिशत) में 30 ग्राम बीज/किलो गीला माध्यम की दर से मिलाया जाता है। मिलाने का काम साफ पक्के फर्श पर या साफ पालीथिन की चादर पर किया जाता है। इस मिश्रण को माध्यम आकार (18"X12") की पालीथिन की थैलियों में अच्छे से दबाकर भरा जाता है। थैली का तीन चौथाई भाग ही भरा जाता है तथा शेष एक चौथाई भाग खाली रखते है। थैली के मुँह को रस्सी से अच्छी तरह बाँध देते हैं और थैलियों में नीचे के दोनों कोनों पर 4-5 छेद कर देते हैं ताकि अतिरिक्त पानी इन छिद्रों से निकाल जाय एवं हवा के आवागमन हेतु 5-6 छिद्र थैली में ऊपर कर देते हैं। इन बीज (स्पान) मिश्रित थैलियों को झोपड़ी में लकड़ी की बनी टाडों (रेक) में लटका देते है या फिर नायलोन की रस्सी के माध्यम से 4-5 थैलियों को एक के ऊपर एक विधि से लटका देते है। झोपड़ी मिट्टी की घास-फूस या पत्तियों की, बाँस की चटाई आदि की बनी हो सकती है। झोपड़ी में सूर्य का सीधा प्रकाश नहीं आना चाहिये तथा तापमान 25-28 डिग्री से.ग्रे., नमी 75-85 प्रतिशत व शुद्ध हवा की समुचित व्यवस्था होनी चाहिये। नमी कम तथा तापमान अधिक होने परपानी का छिडकाव स्प्रेयर द्वारा जमीन तथा झोपड़ी की दीवारों पर अन्दर की तरफ किया जाना चाहिये। थैलियों को झोपड़ी में लटकाने के 15-20 दिनों बाद मशरूम फफूँद का कवकजाल सम्पूर्ण माध्यम में फैल जाता है, जिससे माध्यम सफ़ेद दूधिया रंग का दिखाई देने लगता है। इस समय पालीथिन की थैलियों को काटकर अलग कर देते है। यह मशरूम की वानस्पतिक वृद्धि अवस्था कहलाती है। पालीथिन की थैली हटाने के पश्चात जो पिंडनुमा संरचना प्राप्त होती है, इसे सुतली या नायलोन की रस्सी से लटका देते है। यह मशरूम की प्रजनन अवस्था होती है। इस अवस्था में थैलियों की उचित देखभाल अत्यंत आवश्यक है। दो पिंडनुमा संरचना के बीच का अंतर 10-12 इंच होना चाहिये। थैली हटाने के 3-4 दिन बाद सफ़ेद गांठनुमा संरचना दिखने लगती है जो फफूँद की बटन अवस्था या पिनहेड अवस्था कहलाती है। यह संरचना 5-7 दिन बाद छत्तेनुमा आकृति की फलनकाय में बदल जाती है। जब फलनकाय के किनारे अन्दर की ओर मुड़ने लगे, तब हल्का घुमाकर उसे तोड़ लेते है। यही मशरूम फफूँद का खाने योग्य भाग होता है। इस तरह पहली क्रमश: 22-25 दिन में प्राप्त होती है। दूसरी व तीसरी फसल क्रमश: 5 से 7 दिन के अंतर से प्राप्त होती है। इस तरह एक फसल में 45-50 दिन का समय लगता है एवं 4-5 फसलें जुलाई से मार्च माह तक ली जा सकती है। आयस्टर मशरूम को माध्यमों में उगाने के पश्चात उसका उपयोग पुन: स्पान जैसा किया जा सकता है परन्तु इसकी उपज अपेक्षाकृत कम होती है। ध्यान रहे की मशरूम उत्पादित माध्यम उपज के लिए अधिक श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु स्पान की उपलब्धता न होने की स्थिति में उत्पादक इसका प्रयोग करते है।
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कृषि

Seeds gorakhpur me bhi mil jayega kya
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