सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                 *अखण्ड ज्ञान*

            श्री आर सी सिंह जी रिटायर्ड एयरफोर्स ऑफिसर

विवेक शक्ति केवल मनुष्य योनि में ही जागती है। और जबतक मनुष्य की विवेक शक्ति 100% जाग नहीं जाती, तबतक मनुष्य में कम-अधिक मात्रा में सुख भोगने की भौतिक इच्छाएं बनी ही रहती हैं। इसलिए मनुष्य योनि पाकर किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर अधिक से अधिक सत्संग करते रहने का लक्ष्य बनाये रखना चाहिए। क्योंकि सत्संग करने से ही विवेक शक्ति जागती है।

     जब जीवन में दूसरे जीवों को पदार्थ खिलाने या देने में सुख की अनुभूति होने लगे और लेने में दुख व शर्म महसूस होने लगे। तो समझ लेना चाहिए कि हमारे सतोगुण में वृद्धि हो रही है। अर्थात हमारी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत हो गई है। अन्यथा साधारण मनुष्य सदा लेने की फिराक में ही अपना सारा जीवन बिता देता है। अर्थात मनुष्य भौतिक यात्राओं में ही विचरण करता रहता है।

    भौतिक प्रकृति के सतो, रजो, तमोगुण नित्य होने के बावजूद भी जड़ है। प्रकृति के नियमों के अनुसार सभी पदार्थों का अंतिम परिवर्तन नास होना ही है। फिर भी मनुष्य इन्हीं नाशवान पदार्थों के लिए कर्म ही नहीं विकर्म/पाप भी करता रहता है। दूसरी ओर मिले हुए पदार्थों का सीमा से अधिक भोगने में हम सभी की इंद्रियां सदा ही असमर्थ होती हैं। इसलिए भाग्य से भी मिले हुए अतिरिक्त पदार्थों को अवश्य ही जरूरत मंद लोगों में बांटते रहना चाहिए।

    जब मनुष्य योनि में ही परमात्मा को जानना समझना संभव है, तो मनुष्य योनि में हमारी प्रभु को पाने की इच्छा होनी चाहिए। फिर इच्छा पूर्ति के लिए प्रयास करना हमारा हमारा काम है, शेष परमात्मा का काम है। जैसे दाल रोटी के लिए धन कमाना, फिर रोटी खाना हमारा काम है, लेकिन दाल रोटी को पचाना शरीर का काम है, हमारा नहीं। अर्थात मनुष्य योनि पाकर हमें अपने जीवन में किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहना चाहिए।

*ओम् श्री आशुतोषाय नमः*

RC Singh.7897659218.

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