*84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि में ही अपनी अज्ञानता समाप्त की जा सकती है। क्योंकि अज्ञानता ही मनुष्य के दुखों का मूल कारण है।*
श्री आर सी सिंह जी रिटायर्ड एयरफोर्स ऑफिसरभगवान एक ही है और सभी जीवों का है। सभी जीवों का पक्षपात रहित होकर न्यायपूर्वक कल्याण करते हैं। दूसरी ओर सुख की इच्छा रखना सभी जीवों का स्वभाव है, लेकिन हमें अपने सुख की प्राप्ति के लिए अन्य सभी जीवो के सुख का भी ध्यान रखना होता है। अन्यथा प्रकृति किसी भी जीव को दुख पहुंचाते ही हमारे द्वारा किया गया कर्म पाप मान लेती है, जिसका भविष्य में हमें दुख रूपी फल मिलता है।
भौतिक प्रकृति में सभी जीवों के तीन प्रकार के शरीर होते हैं - स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। निष्काम कर्म करने से स्थूल शरीर, श्रद्धा पूर्वक सत्संग करने से सूक्ष्म शरीर और भक्ति करने से कारण शरीर /स्वभाव पवित्र होता है। यदि मनुष्य अपने जीवन में सकाम भाव से ही कर्म करता है, तो उसके जीवन में कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती है। और यदि भोगों के लिए विकर्म भी करने लगता है, तो मरने के बाद उसकी अधोगति होती है।
एक साधारण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति सामान्य रूप से पुरूषार्थ करने से हो जाती है। लेकिन आवश्यकता से अधिक की चाह रखने से इच्छा का जन्म होता है। यह सभी इच्छायें भोग प्रेरित ही होती हैं। और इन इच्छाओं का बढ़ना ही लोभ है, जिसके रहते क्रोध का आना एक आम बात है। क्रोध में ही मनुष्य अपने शब्दों पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। जिसके फलस्वरूप हिंसा होने की संभावना भी बढ़ जाती है। जिसका रूप आजकल सड़कों पर अक्सर देखने को मिलता है।
भौतिक जगत की 84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि में ही अपनी अज्ञानता समाप्त की जा सकती है। क्योंकि अज्ञानता ही मनुष्य के दुखों का मूल कारण है। और अज्ञानता मिटती है- ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहने से। जोकि केवल मनुष्य योनि में ही संभव है, अन्य किसी योनि में नहीं। अर्थात आत्म जागरण के लिए मनुष्य को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। क्योंकि एक सतोगुणी मनुष्य रजोगुणी और तमोगुणी मनुष्य की तुलना में अपने शुभ संस्कारों को बनाता है और अशुभ संस्कारों को समाप्त करता है। यही मनुष्य जन्म पाने की सार्थकता है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
RC Singh.7897659218.

बहुत सुंदर प्रस्तुति
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