ब्रह्मज्ञान की साधना सबसे बड़ा तीर्थ, सबसे बड़ा धाम और मुक्ति का साधन है।

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                 श्री आर सी सिंह जी 

एक बार की बात है कि एक भैया जो हर साल सावन की पूर्णमासी पर नीलकंठ जाकर भगवान शिव को जल चढ़ाते थे!वह इस बार भी नीलकंठ जाने की तैयारी करने लगे!  उनकी पत्नी जिन्होंने श्री महाराज जी से ब्रह्मज्ञान लिया हुआ था उन्होंने कहा आप 2 दिन लगाकर इतनी दूर जाओगे! समय और पैसा दोनों ही लगेगा!  थकावट होगी सो अलग!  यह सब कर्मकांड,  तीर्थयात्रा तो ज्ञान दीक्षा से पहले की चीजेंं थी!  अब तो गुरु महाराज जी की कृपा से हमें इतना महान ब्रह्मज्ञान मिला है कि हम घर बैठे ही सारे तीर्थों पर जाने का पुण्य कमा सकते हैं!  बस जरूरत है तो पूरी भावना के साथ साधना में बैठने की!  मेरी मानो तो आप कहीं मत जाओ।  घर बैठ कर ही साधना करो!  पत्नी की बात उन्हें जंच गई!  वह साधना में बैठ गए।  करीब 1 घंटे बाद उन्हें दिव्य अनुभव हुआ! जिसमें उन्होंने देखा कि उनके कमरे का दरवाजा खुला और गुरु महाराज जी अंदर आए! फिर बोले नीलकंठ जाना चाहता है तू? तो चल! अब महाराज जी आगे आगे और वह भैया पीछे पीछे!   सबसे पहले महाराज जी वैष्णो देवी के मंदिर ले गए! वहां गुफा के अंदर उन्होंने साक्षात मां शेरावाली को शेर पर बैठे देखा!  वह भैया कहते हैं कि मैंने उनके आगे माथा टेका!फल फूल चढ़ाए!   महाराज जी उन्हें देखकर मुस्कुरातेे रहे!  फिर महाराज जी उन्हें हरिद्वार ले गए!  उन्होंने हर की पौड़ी पर स्नान किया और फिर वह नीलकंठ पहुंचे!वहां उन्होंने शिवलिंग पर जल चढ़ाया!  जैसे ही जल चढ़ाकर वह भैया कहते कि मैं खड़ा हुआ, महाराज जी अंतर्ध्यान हो गये!  उन्होंने झट आंखें खोली!  उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ था कि उन्होंने वैष्णो देवी, नीलकंठ जैसे तीर्थ स्थलों की यात्रा साधना में की है! बिल्कुल ऐसा लग रहा था कि वह अभी अभी वहां से  सशरीर होकर आए हैं!उन्होंने अपने अंतर्यामी महाराज जी का कोटि-कोटि धन्यवाद किया कि उन्होंने उनके भावों को पढ़कर उन्हें अंतर जगत में ही तीर्थ- दर्शन करा दिए!  साथ ही,  तब से उनके मन- चित -आत्मा में यह सत्य हमेशा के लिए ठहर गया कि महाराज जी द्वारा दिए गए ब्रह्मज्ञान की साधना ही सबसे बड़ा तीर्थ है, सबसे बड़ा धाम है, पुण्य- मुक्ति का साधन है!

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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