सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जी रिटायर्ड एयर फोर्स ऑफिसरसंसार में प्रायः यह देखा जाता है कि एक सामान्य इंसान भोजन में विष होने के संदेह मात्र से ही भोजन खाने का त्याग कर देता है। जबकि संसार के सभी विषयों में विष ही विष भरा पड़ा है, ऐसा सभी जानते हैं और मानते भी हैं। लेकिन फिर भी आम साधारण मनुष्य इन्हें चखने से बाज नहीं आता। इसपर बार बार चिंतन करें, तभी एक दिन वैराग्य का बीज अंकुरित होगा।
बिना योग के कर्म और ज्ञान दोनों ही भौतिक है। केवल परमात्मा ही अभौतिक है और परमात्मा की भक्ति का होना या स्मृति बने रहना ही योग है। अर्थात कर्म और ज्ञान, बिना योग के अधूरे हैं। यानि योग होने से ही परमात्मा रूपी मंजिल को पाने के लिए आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होती है, अन्यथा नहीं...।
हम सभी मनुष्यों को अपना जीवन सदा ही धर्म संगत व नीति युक्त जीना चाहिए। अर्थात अपने जीवन निर्वाह व अन्य जीवों के परोपकार के लिए पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। ऐसा करने से ही हमारे अंदर परमात्मा के गुण प्रविष्ट होने लगते हैं और हमारी आध्यात्मिक उन्नति होने लगती है। यही हमारे मनुष्य जीवन की सार्थकता है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
