सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभौतिक विज्ञान के अनुुसार तनाव को इस प्रकार परिभाषित किया गया है -
Stress=Pressure/Area अर्थात तनाव=दबाव/क्षेत्रफल यानी जितना दबाव बढ़ेगा, तनाव का अनुपात उतना ही अधिक होता चला जाएगा! वहीं यदि क्षेत्र (जिस पर दबाव पड़ रहा हैं) विस्तृत होगा, तो तनाव की मात्रा घटती चली जाएगी! अब यदि अपने पर यह परिभाषा लगाएं, तो दवाब उन सब कार्यों का है जो हम पर हावी रहते हैं! हममें तनाव पैदा करते हैं! वहीं क्षेत्र का मतलब हुआ कि हम किस स्तर पर खड़े होकर उन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं! अक्सर हम शरीर, मन और बुद्धि के स्तर पर ही ऐसी परिस्थितियों से जूझते हैं!पंरतु इन परिस्थितियों से जूझते-जूझते अक्सर एक मोड़ ऐसा आता है जब हमारा तन मन बुद्धि जवाब दे देती है! हम थका हुआ, हारा हुआ यानी तनाव ग्रस्त महसूस करते हैं! ऐसे में, अध्यात्म हमारे सामने एक ठोस समाधान रखता है-आत्मिक स्तर के जागरण का! अध्यात्म का अर्थ होता है- आत्मा का अध्ययन अर्थात आत्मा की साक्षात् अनुभूति! अब चूंकि ईश्वर अनंत है और हमारी आत्मा ईश्वर का अंश हैं इसलिए आत्मा का क्षेत्रफल भी असीम हुआ! ऐसे में जब हम असीम आत्मा के स्तर पर खड़े हो जाते हैं, तब हमारा दबाव का सामना करने का क्षेत्र भी अंनत हो जाता है! यानी हम तनावपूर्ण परिस्थितियों के बीच होते कुछ भी एक शान्त, सुखमय और तनाव मुक्त जीवन जी पाते हैं!
सन 2001 में, गुजरात के भुज में भयंकर भूकंप आया था! पूरा का पूरा क्षेत्र बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया था! सामान्य जन-जीवन ठप हो गया था! तब इजराइल की एक आपदा प्रबंधक टीम ने उस क्षेत्र का दौरा किया! इससे पहले वह टीम बहुत से पश्चिमी देशों का भी दौरा कर चुकी थी! उस टीम के नेता ने सारा निरीक्षण करने के बाद कहा कि भारत के लोग निसंदेह दुखी और परेशान हैं! परंतु इतनी भयंकर आपदा के बावजूद उनमें तनाव का स्तर उतना नही जितना पश्चिमी देशों में देखा गया! इसका कारण जानने के लिए उन्होंने लोगों से बातचीत की! तब उनमें से अधिकतर का एक ही जवाब था जैसी भगवान की इच्छा!इस घटना से पता चलता है कि यदि व्यक्ति मात्र ईश्वर को मानकर उसमें विश्वास रखता है, तो भी उसमें विषम परिस्थितियों से जूझने की एक अद्भुत शक्ति आ जाती है! फिर यदि वह ईश्वर को जान ले, तो उसके तनाव मुक्त होने में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
