सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीहर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की आँधी चल रही है। यह कर लूँ, वह करके दिखा दूँ - हर ओर बस होड़ ही होड़ है। पर क्या काम को केवल पूरा करना ही काफी है? या फिर उसे बुद्धिमत्ता के साथ सम्पन्न करना भी आवश्यक है?कुछ ऐसे ही द्वंद्वों के बीच आजकल बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग झूल रहे हैं। आइए इस दुविधा को दो दृष्टांतो से समझते हैं - -
1-- एक बार एक जंगल में खरगोश और कछुए के बीच दौड़ प्रतियोगिता आयोजित की गई। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस दौड़ में तेज भागने वाला खरगोश कछुए से पराजित हुआ। कारण? कछुए का सतत परिश्रम। जहाँ खरगोश मंजिल तक पहुंचने से पूर्व ही विश्राम के लिए रुक गया, वहीं कछुआ निरंतर गति से मंजिल की ओर बढ़ता रहा।
निष्कर्ष - - 'सतत परिश्रम करने वाला विजित हुआ।'
2-- गधा दिन-रात काम करता है। वहीं सिंह थोड़ा सा काम और अत्यधिक आराम करता है। पर फिर भी वह जंगल का राजा कहलाता है। क्योंकि वह थोड़ा सा कार्य भी अपनी बुद्धिमत्ता से सम्पन्न करता है।
निष्कर्ष - - 'घोर परिश्रम से बेहतर है, बुद्धिमत्ता से कार्य करो।'
दिखने में ये दोनों ही स्थितियां विरोधाभासी लगती हैं। पर हैं नहीं। वास्तव में इन दोनों को जोड़ कर ही उचित समाधान निकलता है - माने परिश्रम व बुद्धिमत्ता का समन्वय। क्योंकि दोनों ही मापदण्ड स्वयं में अधूरे हैं। केवल मेहनत से सफलता प्राप्त करना भी असंभव है। मात्र बुद्धिमत्ता का दामन पकड़े रहने से भी लक्ष्य प्राप्त नहीं होता।
सज्जनों, कर्तव्य-कर्म का मार्ग चुनौतिपूर्ण व दीर्घ लगता है। इस मार्ग पर चलते-चलते हम अक्सर हताशा - निराशा महसूस करने लगते हैं। ऐसे में सारी दुष्करता, सारे दुर्भाव हमारा मन अनुभव करता है। इसलिए इस मन को ही किसी उच्च और आनंदमय भाव में लीन कर दें। यह आनंद रस का सरस झरना निरंतर हमारे आत्म- स्वरूप से झरता है।
जब महाभारत का घोर कर्मक्षेत्र बिछा था, तब अर्जुन भी उसे पार करने से घबरा उठा था। उसके हाथों से कर्तव्य का गांडीव छूट रहा था। युद्ध से पूर्व ही हार गया था। इस हताश योद्धा को पुन: धर्म-कर्म के लिए सज्ज किया - श्री कृष्ण ने। कैसे? श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मज्ञान की दीक्षा दी और उसकी भावदृष्टि को आत्म स्वरूप की ऊँचाई पर केन्द्रित किया।
यही सनातन युक्ति है। इसी के द्वारा चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों और कर्तव्यों के रास्ते को हँसते-खेलते हुए और पूरे मनोयोग के साथ पार किया जा सकता है। जहाँ मनोयोग है - वहां विवेकपूर्ण बुद्धिमत्ता व निष्ठापूर्ण परिश्रम अपने आप सम्मिलित हो जाते हैं।
इसलिए अपनी जिम्मेदारियों के लंबे मार्ग पर चलते हुए श्री कृष्ण सरीखे आध्यात्मिक सद्गुरु का हाथ जरूर थामें। उनसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर शाश्वत ध्यान और सुमिरन की तकनीक सीखें, जिससे आपको आत्मा के सतत संपर्क में रहना आ जाए। कर्तव्य - कर्मों के कंटीले मार्ग को पार करने की यही एक उत्कृष्ट कला है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
