सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जी
जिस समय सिकंदर ने अलमस्त, हर फिक्र से बेफिक्र डायोजनीज को देखा, तो कहे बिना रह नहीं पाया- तुम दुनिया के पहले व्यक्ति हो, जिससे मुझे ईर्ष्या हो रही है!डायोजनीज ने जैसे ही ये शब्द सुने, वे ठहाका लगाकर हंस दिए!बोले- सम्राट सिकंदर, जो विश्व को जीतने चला है, उसे जंगल में रहने वाले एक फक्कड़ फकीर से ईर्ष्या?सिकंदर मायूसी भरी आवाज में बोला- भले ही मैं सम्राट हूं, लेकिन बादशाहत का आंनद तुम्हारे दिल में साफ दिखाई देता है। बेशक निर्जन वन में तुम रहते हो, पर असंतोष और बेचैनी का जंगल मेरे अंदर फैला हुआ है! मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि वह मुझे अगले जन्म में सिकंदर नहीं, डायोजनीज बनाकर भेजे!
डायोजनीज ने कहा- डायोजनीज बनने के लिए अगले जन्म तक क्यों इंतजार करना? आ, मैं तुझे अभी, इसी क्षण डायोजनीज बना देता हूं!
सिकंदर बोला अभी कैसे संभव है? अभी तो मैं विश्व विजय की यात्रा पर निकला हूं! डायोजनीज ने कहा अभी नहीं, तो कभी नहीं! यदि इस बार चूका, तो यह अवसर हमेशा के लिए तेरे हाथ से निकल जाएगा! सिकंदर ने कहा मैं विश्व विजय की यात्रा को समाप्त करके तुम्हारे पास लौटूंगा!डायोजनीज ने कहा - उससे पहले तेरी जीवन यात्रा समाप्त न हो जाए सिकंदर! यह अवसर दोबारा तेरे जीवन में शायद दस्तक ना दे!लेकिन सिकंदर ने डायोजनीज की बात को अनसुना कर दिया और वह अपनी विश्व विजय की यात्रा पर निकल गया!सिकंदर फिर कभी वापिस अपने देश नहीं लौट पाया! रास्ते में ही उसकी मृत्य हो गई! याद रखें जीवन में जिस पल सच्चे पूर्ण गुरु का पता चले, उस पल को कभी मत चूकें! क्योंकि पूर्ण गुरु हमारे भूत और भविष्य सब जानते हैं! वे तो हमारे जन्मों जन्मों का लेखा-जोखा जानते हैं!ऐसे में उनके द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलना यह जीवन की सबसे शुभ और मंगलकारी बेला होती है!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
