*सतोगुण की गैर मौजूदगी में रजोगुण/तमोगुण अपनी पकड़ बढ़ा लेते हैं*

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                श्री आर सी सिंह जी 

मनुष्य योनि स्वभाव से तो रजोगुणी है, लेकिन मनुष्य योनि में ही हम अपना सतोगुण बढ़ाकर विशुद्ध सतोगुणी परमात्मा को पा सकते हैं। देखिए,  प्रकृति के तीन गुणों में हम जिस गुण का जितना अधिक संग करते हैं,  उसी गुण का उतना प्रभाव हमारे जीवन में पड़ने लगता है।  इसलिए सतोगुण का अधिक से अधिक संग करें और तमोगुण का परहेज करना चाहिए।   अर्थात तमोगुण का संग केवल नींद लेने में ही करना चाहिए....

     मनुष्य योनि पाकर हमें सुखों की वर्षा में नहाने से सदा ही बचना चाहिए। अर्थात रजोगुण के भोगों में गहरे तल पर कभी नहीं जाना चाहिए।  अन्यथा सतोगुण का पकड़ा हुआ हाथ छूट जाता है।  और सतोगुण की गैर मौजूदगी में रजोगुण/तमोगुण अपनी पकड़ में कब हमें पकड़ लेते हैं,  हमें स्वयं को भी पता नहीं चलता। इसलिए इनसे बचने के लिए अपने जीवन में ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर सत्संग करते रहना चाहिए। 

     जिस तरह से एक जलता हुआ दीपक बिना किसी भेदभाव के सभी दिशाओं में समान रूप से अपना प्रकाश फैलाता है। उसी तरह आध्यात्मिक गुरु का ज्ञान रूपी प्रकाश भी समाज के सभी वर्गों के लिए समान रूप से बिना किसी भेदभाव के प्रदान किया जाता है। हम सभी मनुष्यों का भी कर्तव्य है कि हम अपनी बुद्धि की तराजू में तर्क पूर्वक इस आध्यात्मिक ज्ञान को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करें और अपने जीवन में सुधार लाएं। 

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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