सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीराजा परीक्षित की मृत्यु का एक दिन शेष था, पर राजा का शोक और मृत्यु का भय कम नहीं हुआ तो शुकदेव ऋषि ने राजा को एक कथा सुनाई। 'एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया और रास्ता भटक गया। उसे एक झोपड़ी नजर आई जिसमें एक बीमार बहेलिया रहता था। उसने झोंपड़ी में ही एक ओर मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था और खाने के लिए जानवरों का मांस झोपड़ी के छत पर टांग रखा था। वह बहुत छोटी, दुर्गंधयुक्त झोपड़ी थी। राजा ने विवशतावश बहेलिए से झोपड़ी में रात भर ठहरा लेने की प्रार्थना की।'
बहेलिया बोला - 'मैं भटके हुए राहगीरों को अक्सर ठहराता रहा हूं। पर दूसरे दिन वे झोपड़ी से जाना नहीं चाहते। मैं अब इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता, इसलिए आपको नहीं ठहरा सकता।' राजा ने उसे वचन दिया कि वह ऐसा नहीं करेगा। किंतु सुबह उठते उठते उस झोंपड़ी की गंध में राजा ऐसा रच-बस गया कि वहीं रहने की बात सोचने लगा।उसका बहेलिए से कलह भी हुआ।
शुकदेव ऋषि ने परीक्षित से पूछा - 'क्या उस राजा के लिए यह झंझट उचित था?' परीक्षित ने कहा - 'वह तो बड़ा मूर्ख था जो राज-काज भूल कर दिए हुए वचन को तोड़ते हुए अधिक समय तक झोपड़ी में रहना चाहता था। आखिर वह राजा कौन था?
शुकदेव ऋषि ने कहा - 'वह और कोई नहीं, तुम स्वयं हो। इस मल-मूत्र की कोठरी यानि देह में जितना समय तुम्हारी आत्मा को रहना जरूरी था, वह अवधि पूरी हो गई। अब इसे दूसरे लोक को जाना है। क्या अब भी मरने का शोक करना उचित है? परीक्षित ने मृत्यु के भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वान की तैयारी कर ली और अंतिम दिन की कथा पूरे मन से श्रवण किया।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
