सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभूख से हाल-बेहाल!भोजन लाने या बनाने की कोई व्यवस्था नहीं!परिस्थिति बेहद कठिन!अंग्रेज गुप्तचरों की टोलियां महर्षि अरविंद को खोज रही थीं! मणि और विजय महर्षि के शिष्य थे! इस स्थिति में दोनों ने एक दूसरे की ओर मुरझाई आंखों से देखा!
मणि- अब क्या करें? भूख बर्दाश्त नहीं हो पा रही!
विजय- करना क्या है?बस पानी पीकर सो जाओ!
मणि- और आरो दा( श्री अरविंद) उन्होंने भी तो कुछ नहीं खाया!
विजय- वे तो कितने समय से ध्यान में बैठे हैं! न जाने साधना से कब उठेंगे? मणि, हम गुरु के कैसे शिष्य हैं? उधर गुरूदेव सब सुख सुविधाओं को त्याग कर, भूख प्यास से कोसों दूर केवल अपने लक्ष्य में स्थित है! उसकी पूर्ति के लिए साधनास्थ हैं! वहीं हम हैं कि अपनी भूख शांत करने के उपाय खोज रहे हैं! गुरु की चिंता हमारा चिंतन क्यों नहीं है? यही सोचकर दोनों साधना में बैठ गए! कई घंटे बीत गए! तभी, धीमे से एक स्वर उठा मणि और विजय उठो!
महर्षि अरविंद- मुझे अभी याद आया कि आज किसी ने भोजन ही नहीं किया! तो फिर ठीक है तैयार हो जाओ! दोनोें आंखें मूंद लो! अब धीरे-धीरे आंखे खोलो!दोनों के चेहरों पर नितांत शांति थी! सामने भोजन की पूरी व्यवस्था थी!
महर्षि अरविंद- हैरान मत हो! मैंने कोई जादू से इसे प्रकट नहीं किया है! मुझे मालूम है कि रसोई में सब डिब्बे खाली हैं! लेकिन मुझे एक अठन्नी मिल गई थी! कहां से आई, यह तो पता नहीं! मैंने उस अठन्नी से सब्जियां दाल और चावल मंगवा लिए!भोजन बनाकर तुम दोनों के लिए लाया हूं! खा लोगे ना! विजय और मणि की आंखों से टप-टप आंसू बहने लगे!ऐसा प्रेम तो शायद उन्हें अपनी माता से भी कभी नहीं मिला! दोनोें छोटे बच्चों की तरह अपने गुरु के चरणों से लिपट गए!महर्षि अरविंद कहते हैं आज जब मैं ध्यान में बैठा था, तब गुरु की ममता ने आकर मुझे घेर लिया!उन्होंनेे मेरे कानों में धीमे से कहा तुम्हारे दोनों शिष्यों ने कुछ नहीं खाया है! क्या तुम्हें उनका ख्याल नहीं? चलो, उनके भोजन की व्यवस्था करो!इस आदेश को पाकर मैं तुरंत उठा और भोजन बनाकर तुम्हारे पास आ गया! आओ! अब भूख से और कष्ट मत सहते रहो, खाना खाओ!
शिष्य आज स्वयं को धन्य-धन्य महसूस कर रहे थे! आत्मा को तो पहले ही गुरुदेव दिव्य प्रकाश से तृप्त कर चुके थे! अब तन की भूख भी अपने हाथों से बनाए महाप्रसाद से शांत करके उन्होंने अपनी कृपा का सारा अंबार उन पर लुटा दिया था!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
