सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभारत की विशेषता उसकी अध्यात्मपरक संस्कृति है, जिसका आधार ब्रह्मज्ञान है। एक बार ऋषि कुमार नचिकेता हाथ जोड़कर सद्गुरु यमाचार्य से कहते हैं कि इस स्थूल जगत से परे, उस परम तत्व के विषय में मुझे बताएं। यमाचार्य
उससे कहते हैं - 'हे नचिकेता, इस मानव की हृदय गुफा में एक ऐसा अलौकिक संसार है, जहाँ सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, परमात्मा निवास करते हैं। उस सूक्ष्म तत्व को जानने के लिए अति सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता होती है।'
नचिकेता ने पल भर की भी देर नहीं की - 'हे प्रभु, कृपाकर मुझे उसी सूक्ष्म तत्व का साक्षात्कार कराएं। वह सूक्ष्म दृष्टि मुझे प्रदान करें।' यमाचार्य ने उसी समय ब्रह्मज्ञान अथवा तत्वदर्शन प्रदान किया और कहा - 'ले नचिकेता, यही वह परम तत्व है, अंतर्जगत है।'
कहने का मतलब कि हमारे भारत के मूल में सदा से ऐसा उच्चकोटि का विज्ञान, वह ब्रह्मज्ञान रहा, जिसने ईश्वर को मानने की नहीं, हृदय गुफा में उसका दर्शन अथवा साक्षात्कार करने की बात की। फिर यही दर्शन वो दृढ़ आधार बना, जिस पर भारतीय संस्कृति, चरित्र और विज्ञान की भव्य इमारतें खड़ी हुई। ऐसा नहीं था कि हमारे ऋषियों ने गोष्ठियाँ करके आचार-विचार-व्यवहार - नियम आदि बनाए और उन्हें भारतीय संस्कृति का रूप दे दिया। अंतर्जगत में उतरने पर, ईश्वर से सम्पर्क साधने पर हमारे ऋषियों से जो आचार छलका, व्यवहार व चरित्र झलका, विचार प्रस्फुटित हुए - वही भारतीय संस्कृति का आकार लेते चले गए।
जहाँ तक विज्ञान की बात है, ग्रंथों में कहा गया - 'यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे' - जो ब्रह्माण्ड में है, वही इस पिण्ड में समाया है। हमारा कपाल स्थल सूक्ष्म रूप से एक ऐसी माइक्रोचिप है, जहाँ पर समस्त ब्रह्माण्ड अपने समूचे रहस्यों व शोभाओं के साथ समाया हुआ है। ब्रह्मज्ञान की साधना के द्वारा हमारे ऋषियों ने इसी माइक्रोचिप पर अन्वेषण किया। अंतस के ब्रह्माण्ड में झाँका। यही कारण था कि ब्रह्माण्ड के गुप्त से गुप्त वैज्ञानिक रहस्य उनके लिए स्वत: उद्घाटित होते चले गए। सो ब्रह्मज्ञान ही आधार बना हमारी चारित्रिक तथा वैज्ञानिक संस्कृति का।
आज 'गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी' द्वारा ब्रह्मज्ञान में दीक्षित उनके करोड़ों शिष्य - शिष्याएं जनमानस को अंतर्जगत से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
'श्री रमेश जी'
