*कीमती समय को व्यर्थ ना गवाएं*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                               श्री आर सी सिंह जी 

वैसे तो अध्यात्म की डगर को तलवार की धार कहा जाता है। लेकिन समय- समय पर हमें मार्के के सूत्र देकर सतगुरु इसे बहुत आसान बना देते हैं। एक साधक को चाहिए वह इन सूत्रों को अच्छे से समझ ले। क्योंकि ऐसा करने पर वह  बड़ी आसानी से इस पथ की उलझनों को पार कर सकता है। कुछ ऐसे ही सूत्रों को समेटे है यह घटना जो योगानंद परमहंस जी और उनके शिष्यों के बीच घटी थी। इन्हें जानकर अवश्य ही हमें साधना पथ पर चलने में मदद मिलेगी।

गुरुदेव से बात करने की इच्छा लिए एक शिष्य ने उनके कमरे में झांक कर देखा। योगानंद जी ने बड़े प्यार से हाथ से अंदर आने का इशारा किया। इससे पहले कि शिष्य उनके पास आकर बैठता योगानंद जी ही उठ कर उसके पास चले आए। उसका हाथ थामा और उसे दीवार पर लगी बड़ी सी घड़ी के पास ले गए। घड़ी का पेंडुलम टिक- टिक की आवाज करता हुआ इधर से उधर जा रहा था। उस शिष्य की ओर देखते हुए योगानंद जी बोले सुनो तो यह घड़ी क्या कह रही है? शिष्य ने भोले भाव से उनका प्रश्न उन्हीं से पूछ लिया। योगानंद जी ने टिक- टिक की आवाज करते हुए उस पेंडलम की ओर उंगली दिखाते हुए कहा -यह घड़ी बोल रही है देख देख। फिर शिष्य की भ्रुकुटी के मध्य उंगली ले जाकर बोले- यह कह रही है देख- देख अपनी आत्मा के प्रकाश को देख... भीतर की दिव्यता को देख ...समय बीतता जा रहा है। एक पल भी व्यर्थ गवाए बिना अधिक से अधिक ध्यान साधना से आत्मसाक्षात्कार कर ...उसके संग जुड़!यदि यह कीमती समय हाथ से निकल गया तो फिर दोबारा नहीं आएगा। शिष्य ने हाथ जोड़कर हां में सिर हिला दिया। जानता था कि गुरुदेव ने कितनी खूबसूरती से उसके प्रश्न को बिना पूछे ही हल कर दिया था। दरअसल वह मन में बैठीे बेकार की एक बात से परेशान हुआ जा रहा था। उस बात को सोच सोच कर यूं ही समय गंवा रहा था। इस कारण से उसकी ध्यान साधना भी प्रभावित हो रही थी। गुरुदेव ने सीधे ही इशारा कर दिया -बेकार की बातों में पड़कर समय बेकार मत करो। अधिक से अधिक ध्यान साधना करो लेकिन अगले ही पल उस शिष्य ने दूसरी समस्या गुरुदेव जी के श्री चरणों में रख दी। गुरुदेव कभी-कभी मन इतना बेचैन होता है कि कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती ..ध्यान साधना करने की भी नहीं, ऐसे में क्या किया करूं?

योगानंद जी ने बड़े ही प्यार से उसे समझाया, जब कुछ भी करने का मन ना करें, साधना भी नहीं, तो क्या करें... क्या करें (थोड़ा रुक कर मुस्कुराते हुए) ऐसा करें कि तब फिर कुछ भी ना करें ...बस अपने गुरु के संग बिताए पलों को याद करें ...उनकी बातों को स्मरण करें ...उन लम्हों को फिर से जिएं ..ऐसा करने से तुम्हारा समय कुछ नहीं करते हुए भी व्यर्थ नहीं जाएगा। साथ ही तुम उस बेचैनी से निकलकर मन में सुकून महसूस करोगे।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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