*हम मानव शरीर में ही ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                श्री आर सी सिंह जी 

जिज्ञासा मनुष्य के स्वभाव का सहज अंग है!दो-तीन वर्ष का बालक जिसने अभी ठीक से बोलना शुरू ही किया है, वह भी अपनी मां से अनेक प्रश्न करता है!इतिहास  साक्षी है कि मनुष्य की इसी जिज्ञासु प्रवृति ने उसे वनस्पति, प्राणी जगत और ब्रह्मांड संबंधित अनेक  गुत्थियां सुलझाने की ओर अग्रसर किया!  लेकिन दुर्भाग्य वश,  बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जिनकी जिज्ञासा जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए होती है!  गुरूदेव श्री आशुतोष महाराज जी कहते हैं कि- न्यूटन ने पेड़ की शाखा से सेब को गिरते हुए देखकर गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज की!  हालांकि यह खोज विज्ञान और समाज के लिए बहुत उपयोगी है! किंतु यदि वह उस बल पर विचार करता,  जिसके द्वारा वह सेब पेड़ की शाखा से जुड़ा हुआ था,  तो हो सकता है कि वह जीवन के श्रेष्ठतम नियम की खोज कर लेता!  इसलिए सर्वोत्तम जिज्ञासा है स्वयं के विषय में जानने की!जीवन के वास्तविक अर्थ और लक्ष्य को जानने की!एक बार यक्ष युधिष्ठिर से पूछते हैं-  कौन सी विद्या सभी विद्याओं की राजा है?  तो युधिष्ठिर  कहते हैं उस परम सत्ता ईश्वर का ज्ञान ही राजविद्या है! पूर्ण गुरु इसी राजविद्या- ब्रह्मज्ञान के मेघ बरसाने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं!  इस विद्या से हम मानव शरीर में ही ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं!  यही वह विद्या है, जिसका प्रतिदिन अभ्यास करने से हम अपने मन को साध सकते हैं!  यही मन को हमारा सच्चा मित्र बना देती है!इस विद्या की प्राप्ति के पश्चात् ही हम भौतिक पदार्थों में उलझे बिना, उनका उपयोग सफल जीवन यापन के लिए कर पाते हैं!  लेकिन हमारा दुर्भाग्य या हम कह सकते हैं कि हम सोचते हैं कि हमें मृत्यु नहीं आएगी!तभी तो हम जीवन में ज्ञान प्राप्ति के लिए विलंब करते हैं!एक बार किसी व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध से पूछा- भगवन!  आप ईश्वर को जानते हैं और दूसरों को भी ईश्वर का दर्शन करवाने में समर्थ हैं तो आप इस धरा पर सभी को ईश्वर की अनुभूति करवा कर धन्य क्यों नहीं कर देते?  तब महात्मा बुद्ध ने कहा- क्या तुम हर दिशा में जाकर यह पता लगा आओगे कि ऐसे कितने लोग हैं,  जो ब्रह्मज्ञान के इच्छुक हैं?वह व्यक्ति तुरंत गया और यह देखकर हैरान रह गया कि कोई भी ईश्वर दर्शन के लिये इच्छुक नहीं था!इसलिए हम और आप ऐसी भूल ना करें!  ईश्वर से प्रार्थना करें कि मुझे आप और केवल आप ही चाहिए!

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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