*केवल मनुष्य योनि ही कर्म प्रधान है।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                               श्री आर सी सिंह जी 

84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि में ही परमात्मा को पाया जा सकता है। अर्थात परमात्मा ने मनुष्य योनि हमें केवल आध्यात्मिक यात्रा के लिए ही दी है। मरते समय तक हम जितनी यात्रा कर लेते हैं, अगले मनुष्य योनि में आध्यात्मिक यात्रा उस बिंदु विशेष से आगे की ही करनी होती है। अर्थात पुरानी की गई आध्यात्मिक यात्रा बेकार नहीं जाती। लेकिन भौतिक उन्नति मरने के साथ ही समाप्त हो जाती है। 

      मनुष्य स्वभाव से तो रजोगुणी है यानी प्रकृति के रजोगुण से अधिक बंधा हुआ है। लेकिन मनुष्य में ही सतोगुण में वृद्धि की जा सकती है। जिसका सरल उपाय ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सत्संग करना है। यह सत्संग सफेद रंग की तरह धीरे धीरे ही अपना असर दिखाता है। जबकि कुसंग काले रंग की तरह अपना असर तुरंत दिखाता है। इसलिए अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के लिए आरंभ से ही कुसंग/बुराईयों से बचना चाहिए। 

     84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि ही कर्म प्रधान है। मनुष्य से नीचे की सभी योनियों के सभी जीवों की यात्रा इंसान बनने की ओर हर पल प्रकृति के अनुसार हो रही है। लेकिन इंसान अज्ञानता वश सत्संग के अभाव में केवल भोगों के लिए ही पाप कर्म करता हुआ दोबारा से इस निकृष्ट योनियों में लौटने का अपना दुर्भाग्य बना रहा है। 

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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