*भगवदगीता से बढ़कर कोई शिक्षक नहीं है*

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                             श्री आर सी सिंह जी 

भगवदगीता एक  दार्शनिक ग्रंथ कम और एक प्राचीन धर्म ग्रंथ ज्यादा है!  यह कोई रहस्यात्मक ग्रंथ नहीं, जो केवल विशेष रूप से दीक्षित लोगों के लिए हो, और जिसे वे ही समझ सकते हो। बल्कि यह एक लोकप्रिय काव्य है,  जो उन लोगों की मदद करता है,  जो भौतिक चीजों में अर्थ ढूंढते फिर रहे हैं! यह सभी संप्रदायों के उन सभी साधकों के लिए है, जो परमात्मा के नगर की ओर आंतरिक मार्ग पर चलना चाहते हैं! इस बात का कोई महत्व नहीं है कि इसका उपदेश देने वाले कृष्ण कोई ऐतिहासिक व्यक्ति है या नहीं!महत्वपूर्ण बात भगवान का सनातन अवतार है, जो इस विश्व में और मनुष्य की आत्मा में पूर्ण और दिव्य जीवन को लाने की शाश्वत  प्रक्रिया है! प्रारंभिक दिनों में गीता का प्रसार चीन और जापान तक फैला हुआ था और बाद में पश्चिम के देशों में भी फैला! 

      गीता चाहती है कि कर्म में जुड़ने से पहले हम जीवन के अर्थ को समझें!यह विचार के गौरव की उपेक्षा करके कर्म के प्रति अंधभक्ति का समर्थन नहीं करती!  गीता कहती है कि आत्मा के सत्यों को केवल वही लोग पूरी तरह से समझ सकते हैं,  जो कठोर अनुशासन द्वारा उन्हें ग्रहण करने के लिए खुद को तैयार करते हैं!आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें अपने मन को सब प्रकार की भ्रष्टता से मुक्त करना होगा!  गीता के अनुसार, परमात्मा की ज्योति आत्मा में रहती है, अन्यत्र  कहीं नहीं!  यह सब प्राणियों में समान रूप से चमकती है और इसे अपने मन को समाधि में शान्त करके स्वयं देखा जा सकता है!  गीता के लिए यह संसार अच्छाई और बुराई के मध्य होने वाले एक सक्रिय संघर्ष की भूमि है,  जिसमें परमात्मा की गहरी दिलचस्पी है!  वह अपने प्रेम की संपत्ति उन मनुष्यों की सहायता करने के लिए लुटाता है,  जो उन सब वस्तुओं का प्रतिरोध करते हैं,  जो मिथ्या, कुरूपता और बुराई को जन्म देती है!क्योंकि परमात्मा पुरी तरह अच्छा है और उसका प्रेम असीम है।इसलिए वह संसार के कष्टों को लेकर चिंतित है!

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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