*ध्यान साधना द्वारा अंत:करण की गहराइयों में सद्गुरु के योगेश्वर रूप का प्रत्यक्ष दर्शन होता है।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                श्री आर सी सिंह जी 

एक बार अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते है- हे केशव! हम आप समान सद्गुरू सत्ता को समझ क्यों नहीं पाते?  तो भगवान श्री कृष्ण कहते हैं एक ही कारण है, तुम मुझ दिव्यतम को समझने के लिए अपनी स्थूलतम बुद्धि लगाते हो! मैं अपनी योगमाया से सदा आवृत्त रहता हूं! मेरी सत्ता सबके सामने प्रत्यक्ष नहीं होती है! इसलिए मूढ लोग मुझ अविनाशी को जान नहीं पाते! मुझ अव्यक्त को ये बुद्धिजीवी लोग व्यक्ति मान लेते हैं!  साधारण मनुष्यों की तरह जन्म लेता, मृत होता और क्रियाएं करता समझते हैं!तो अर्जुन कहते हैं- भगवन् ऐसे बुद्धि केंद्रित मनुष्यों की गति क्या होती है?  भगवान श्री कृष्ण कहते हैं ऐसे साधकों के साथ भक्ति मार्ग की सबसे अप्रिय घटना घटती है-  संशय का जन्म और श्रद्धा का गमन!  जैसे ही संशय का कीड़ा पनपता है और श्रद्धा की बेल धराशाई होती है तो ऐसा विवेकहीन, श्रद्धा रहित संशययुक्त मनुष्य निश्चित ही पथ भ्रष्ट हो जाता है और विनाश को प्राप्त होता है! ऐसा मनुष्य ना तो इस लोक में और ना ही परलोक में सुख को प्राप्त कर पाता है! वह मृत्यु रूप संसार में भटकता रहता है!संशयात्मक बुद्धि होने से ये लोग मुझे तत्व से नहीं जान पाते और मेरे  शाश्वत ज्ञान मार्ग से पतित हो कर गिर जाते हैं!  तो अर्जुन  भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं- हम घातक संशयों से कैसे बचें?  हम सद्गुरु सत्ता और उनकी लीलाओं को कैसे जाने, कैसे पहचाने?तो भगवान श्री कृष्ण कहते हैं एक ही मार्ग है, अर्जुन-  ब्रह्मज्ञान और उसका साधनाभ्यास!अपनी परा भक्ति (ब्रह्मज्ञान आधारित साधना -सुमिरन) द्वारा ऐसा साधक मुझ जगतगुरु सत्ता को, मैं जो हूं और जितना हूं- ठीक वैसा का वैसा जान लेता है! मुझे जानने के बाद मुझ में ही स्थित रहता है!ऐसा ब्रह्मज्ञानी साधक मुझे तत्व सहित जान पाता है! इसलिए अपनी मन बुद्धि को ध्यान साधना द्वारा परम तत्व में स्थित कर दो!  बाहर से भीतर की यात्रा शुरू करो!  फिर देखना, अंतःकरण की गहराइयों में तुम्हें सद्गुरु के योगेश्वर रूप का प्रत्यक्ष दर्शन होगा। 

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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