*गुरु - एक सच्चा दोस्त*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                               श्री आर सी सिंह जी 

मानव हृदय एक पुष्प विहीन वाटिका है। इसमें भावुकता है, अनुभव शक्ति है, प्रेम तथा करुणा जैसी कोमल भावना विद्यमान है। परंतु यह वाटिका सूनेपन से बाहर निकलकर तबतक पल्लवित तथा पुष्पित नहीं हो सकती, जबतक एक सम्पूर्ण सद्गुरु का आशीर्वाद इसे नसीब न हो, जो हमारे भीतरी अंधकार को दूर करने में सक्षम है। जिस प्रकार सूर्य की किरण बगिया में फूल खिलाती है उसी प्रकार गुरु कृपा हृदय बगिया में प्रकाश बिखेरती है।

     सामान्य मानव जीवन में कुछ भी जीने योग्य नहीं है। मात्र पेट भरकर खाना, नींद भरकर सोना, निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए हंसना, रोना या प्रेम प्रदर्शित करना आदि। सामान्य जीवन क्रियाओं में कुछ भी आकर्षक प्रतीत नहीं होता। उत्तम वस्त्रों, मंहगे गहनों या आलीशान भवनों की प्राप्ति हेतु रात दिन धन संग्रह में लगे रहना। और एक दिन इस सबको छोड़कर चल देना- यह सारा जगत व्यापार क्या मूर्खता से भिन्न कुछ और है?

     यह संसार नश्वर है, स्वार्थ और दुखों का घर है। चिंताओं परेशानियों एवं विषय वासनाओं से भरपूर है। आज के भौतिक युग में अधिकतर मनुष्य केवल सांसारिक धन सम्पत्ति इत्यादि को ही सुख का हेतु मानते हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं कि केवल सांसारिक धन सम्पत्ति इत्यादि के द्वारा ही हमें सुख की प्राप्ति हो जाए। आज इसी मृगतृष्णा में मानव भटक रहा है, जबकि सांसारिक वस्तुओं में सुख नहीं है।

     आज का मानव यह सोचता है कि बस सांसारिक रिस्ता ही अपना है। जबकि सांसारिक रिस्ता क्षणभंगुर है। यहां के रिस्ते स्वार्थी एवं केवल दुख देने वाले होते हैं। मानव जब सांसारिक रिस्तों पर पूर्ण विश्वास कर लेता है और बाद में जब ठोकरें मिलता है तो वह टूट जाता है। गम को भूलाने के लिए नशा का सेवन करने लगता है। डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। और अंत में कोई सहारा नहीं मिलता है तो वह आत्महत्या का महापाप कर बैठता है। इस मायामय जगत में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति सुख की प्राप्ति की इच्छा से सांसारिक कर्मों में लिप्त है।

     मानव जन्म लेकर संसार में आने का कोई तो प्रयोजन है ही। इस तन को पाने के लिए बार-बार प्रभु से प्रार्थना करता है और मानव तन पाकर वह अपना कल्याण करेगा। ईश्वर भक्ति का पुरुषार्थ केवल मानव योनि में ही संभव है। परंतु विडम्बना देखिए, जिस नाम के सहारे वह गर्भ योनि में नौ मास तक उल्टा लटका रहता है। उसी सनातन नाम को बाहर आते ही भूल जाता है। क्यों? क्योंकि वह स्वयं को एक स्वतंत्र इकाई मानकर मनमानी करने लगता है।

     अपने पतन का बीज मानव स्वयं बोता है। ईश्वर से जुड़कर ही जीवन जीने योग्य बनता है। और यह तभी संभव होता है जब जीवन में पूर्ण सद्गुरु माता-पिता और दोस्त के रूप में मिल जाते हैं। गुरु के बिना घोर अंधेरा है। गुरु के बिना न तो हमें सत्य की समझ आ सकती है। और न ही हमें मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है। गुरु हमारे जीवन में एक दोस्त के रूप में आते हैं, जो हमें पग-पग पर राह बताते हैं।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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