सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभौतिक प्रकृति के 84 लाख योनियों में असंख्य जीव हैं। अधम से अधम योनि के भी सभी जीव जीना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति सभी जीवों में पाई जाती है, चाहे चींटी हो या हाथी।इन सभी जीवों व सभी मनुष्यों की सामान्य मृत्यु मिले हुए प्रारब्ध के सुख-दुख भोग लेने के बाद ही आती है। फिर मरने के बाद आत्मा 84 लाख योनियों में किसी एक भौतिक शरीर में अपने बने हुए संचित कर्मों के अनुसार अगला जन्म लेने को बाध्य होती है। यही बंधन है, जो मनुष्य को उसके लक्ष्य, उस परम धाम तक पहुँचने नहीं देता। मनुष्य इसी कर्म के बंधन के कारण ही भटकता रहता है। महापुरुष कहते हैं कि केवल अच्छे कर्मों के द्वारा भी कल्याण संभव नहीं है। अच्छे कर्मों का फल मिलता है 'स्वर्ग'। परंतु स्वर्ग भी स्थायी नहीं है। पुण्य कर्मानुसार स्वर्ग का सुख भोगने के बाद पुनः आवागमन के बंधन में जाना पड़ता है।
कर्मों की सार्थकता तभी है, जब वह प्रभु को समर्पित कर दिए जाएं। मुण्डकोपनिषद में कहा गया है कि प्रभु न तो इन आँखों के द्वारा देखा जा सकता है और न ही अन्य इन्द्रियों के द्वारा प्रभु की प्राप्ति हो सकती है। तपस्या एवं कर्मों के द्वारा भी प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब ज्ञान की कृपा होती है, अन्तर्दृष्टि खुलती है, तभी मनुष्य अपने अन्तर में निष्कलं ब्रह्म का ध्यान करते हुए प्रभु का दर्शन करता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दर्शन दिए तो कहते हैं - हे अर्जुन, तुमने अभी जिस स्वरूप को देखा है उस रूप में मुझको न तो वेदों के अध्ययन के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, न तपस्या के द्वारा, न दानादि के द्वारा और न ही यज्ञ के द्वारा देखा जा सकता है।
तो हम किस प्रकार इन बाहरी कर्मों के द्वारा प्रभु प्राप्ति के बारे में कह सकते हैं। आश्चर्य है कि आज बड़े बड़े आचार्य, पाठी, पुरोहित मनुष्यों को सांसारिक कर्म काण्डों में ही उलझाए रखा है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
