*हमारे आपके सभी कर्म विकर्म केवल हमारे आपके अपने अपने खाते में ही लिखे जाते हैं।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                 श्री आर सी सिंह जी 

सभी मनुष्यों में मन के 5 विकार कम-अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। और अक्सर ऐसा देखा जाता है कि मनुष्य का जिस वस्तु या व्यक्ति से स्वार्थ होता है, उसी से ही मोह होता है। इसीलिए हमारा-आपका मोह आकाश के बादलों के समान एक वस्तु /व्यक्ति में नहीं टिकता। जबकि प्रेम स्वार्थ रहित होता है और भगवान से प्रेम हुए बिना प्रकृति के अन्य जीवों के प्रति भी प्रेम नहीं होता।

     प्रकृति परमात्मा की ही एक शक्ति है। प्रकृति मनुष्य योनियों में ही किए गए सभी सकाम कर्मों का फल सुख-दुख रूप में देती है। केवल मनुष्य योनि में ही दुखों को सहने की पीड़ा का पूर्ण रूप से एहसास होता है। यह एहसास ही इंसान के अंदर प्रार्थना को जन्म देता है। जब इंसान हाथ जोड़कर प्रभु के आगे अपनी गल्तियों को मन से स्वीकार करता है, बस उसी क्षण से उसके दुखों का अंत होना प्रारंभ हो जाता है। लेकिन जो इंसान गलती करके भी नहीं मानता तो समझ लीजिए कि उससे भविष्य में भी बार-बार पुन: गलतियां होती ही रहेंगी। और उन गलतियों की सजा भी 84 लाख योनियों में दुख रूप में भुगतना ही पड़ता है।

     जिस तरह भारत में रहने वाले सभी देशवासियों को अलग-अलग आधार नंबर दिया गया है। उसी तरह परमात्मा के यहां भी भौतिक प्रकृति में रहने वाली सभी आत्माओं को अलग-अलग आधार नंबर (समझाने हेतु) दिया गया है। अर्थात सभी मनुष्य ही नहीं बल्कि भौतिक प्रकृति का प्रत्येक जीव विभिन्न 84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि में ही किए गए पाप-पुण्य के लेखे-जोखे के अनुसार ही दुख-सुख भोगता है ।किसी अन्य जीव के नहीं। अर्थात हमारे-आपके सभी कर्म-विकर्म केवल हमारे अपने-अपने खाते में ही लिखे जाते हैं।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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