सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीबात उन दिनों की है जब चीन पर ब्रिटेन का अधिकार था! शंघाई के गुरुद्वारे में एक ग्रंथी था!अनन्य भक्त! ईश्वरीय प्रेम से लबालब! एक दिन उसके गुरुद्वारे के बाहर एक सज्जन की हत्या हो गई! पुलिस ने उस ग्रंथी को गिरफ्तार कर लिया!निर्दोष ग्रंथी को हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुना दी गई! फांसी के लिए हांगकांग से जल्लाद को बुलाया गया! तब ग्रंथी के मन से आर्त पुकार उठी- हे प्रभु मैंने तो सबको यही सिखाया- सुनाया कि प्रभु सच्चे भक्त पर कभी आंच तक नहीं आने देता! पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब के शबद तेरी ऐसी ही महिमा का गुणगान करते हैं! इसलिए तेरे दयालु और भक्तों के रक्षक होने पर मुझे रत्तीभर भी संदेह नहीं है!तो फिर क्या मैं ही गलत हूं, दोषी हूं...वह यह सोच ही रहा था कि जल्लाद ने उसके गले में फंदा डालकर नीचे का तख्ता हटा दिया! लेकिन चमत्कार घटित हुआ!रस्सा टूट गया और ग्रंथी फर्श पर जा गिरा!अधिकारी गणों को गहरा धक्का लगा! तब एक अन्य मजबूत रस्सा मंगवाया गया! ग्रंथी के वजन से चार गुना अधिक वजन उस रस्से पर लटका कर उसकी मजबूती परखी गई! फिर दोबारा फांसी की व्यवस्था की गई! ग्रंथी के गले में फंदा डाला गया! जैसे ही तख्ता खींचा गया रस्सा बीच से टूट गया था और ग्रंथी की रक्षा हुई थी! तब वहां पर मौजूद ब्रिटिश राजदूत यह कहने को बाध्य हो गए थे- ग्रंथी निर्दोष है!इसलिए स्वयं परमात्मा इसका रक्षक बनकर खड़ा हो गया है और परमात्मा के कानून के आगे हम इंसानों के कानून की क्या बिसात?ग्रंथी को बाइज्जत बरी कर दिया गया!
ईश्वर अपने भक्त प्रेमियों की रक्षा के लिए हर सीमा को लांघ जाता है! यदि हम ईश्वर की इस महत्ती कृपा के साथी बनना चाहते हैं तो आवश्यकता है उस पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखने की!गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं जाने बिनु न होए प्रतीति, अर्थात ईश्वर को जाने बिना उस पर विश्वास नहीं हो सकता!लेकिन तब जब हम अपने भीतर गुरु कृपा से ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेते हैं, तभी हम उसे जान पाते हैं! और ईश्वर और हमारा एक अटूट सम्बन्ध बन जाता है! तभी इस सम्बन्ध का निवार्ह ईश्वर प्राणपन से करता है!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
