सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीजनकवंशी जनदेव मिथिला के राजा थे। वह प्रजा के दुख दूर करने में हर समय तैयार रहते थे।एक बार कपिला के पुत्र महामुनि पंचशिख मिथिला पहुंचे। महामुनि की विरक्ति, तपस्या और ज्ञान देखकर राजा बहुत प्रभावित हुए। मुनि पंचशिख भी राजा की श्रद्धा, भक्ति भावना के कायल हो गए। मुनि ने उन्हें मोक्ष मार्ग का उपदेश देते हुए बताया, संसार को स्वप्नवत मानना चाहिए। और किसी भी सांसारिक सुख दुख में समान रहना चाहिए। सच्चा सुख भगवान की भक्ति से ही मिलता है। राजा ने मुनि के उपदेश का पालन करने का संकल्प लिया और निष्काम भाव से प्रजा के हित तथा आत्मज्ञान में प्रवृत्त रहने लगे।
भगवान विष्णु तक जब राजा जनदेव की ख्याति पहुंची तो वह परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मण का रूप धारण कर मिथिला पहुंचे। उन्होंने जान बूझ कर कोई अमर्यादित कार्य कर दिया, तो राजा ने कहा मैं ब्राह्मण को दंड नहीं देता। तुम मेरे राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ। क्रोध में आकर भगवान विष्णु ने उनके एक भवन में आग लगा दी। राजा आग देखकर बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए वह विष्णु भगवान जी से बोले भवन के जलने से मुझे थोड़ा भी दुख नहीं हुआ है। तभी राजा ने देखा कि ब्राह्मण की जगह विष्णु भगवान खड़े थे। वह राजा से बोले तुम्हारा व्यवहार देखकर मुझे पूरा यकीन हो गया है कि तुम वास्तव में आत्मज्ञान को प्राप्त कर चुके हो, क्योंकि आत्मज्ञानी पुरुष ही ऐसा कर सकता है। वह जो भी निर्णय लेता है बहुत ही विवेक से लेता है। वह किसी भी विपरीत परिस्थिति में घबराता नहीं है। इसलिए तुम मोक्ष के अधिकारी हो।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
