सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीएक व्यक्ति बीमार हो गया! उसके संपर्क में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ आए, जिन्होंने उसके रोग के कारण अलग अलग बताए! लेकिन वहीं ज्ञानी संत कहते हैं- रोग का एक मुख्य कारण है, तुम्हारे द्वारा इस या पूर्व जन्म में किए गए कर्म! अध्यात्म दर्शन का यह प्रमाणित तथ्य है कि हमारे जीवन में चाहे कोई भी अनहोनी हो, हर दुख का मुख्य कारण हमारे अपने गत कर्म हैं! क्या सर्वनियंता ईश्वर हमारी रक्षा कर सकता है? पूर्ण रूप से तो बिल्कुल नहीं! क्योंकि वह तो न्यायाधीश की भूमिका में है! हर बुरे कर्म के लिए उसे तो दण्ड देना ही होगा! वह अपनी न्याय प्रणाली से बंधा हुआ है!तो रक्षक कौन हो सकता है? निसंदेह ब्रह्मनिष्ट सद्गुरु! सद्गुरु हमारी रक्षा किस प्रकार करते हैं!दरअसल हमारे शरीर के तीन स्तर हैं! स्थूल शरीर, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम शरीर! सद्गुरु हर शिष्य के भीतर गहरा उतरकर उसके कारण शरीर में पैठे इन कर्म- परमाणुओं को जान लेते हैं! इसलिए वे न केवल अपने शिष्य के हर जन्म के हर कर्म से अवगत होते हैं, बल्कि यह भी जानते हैं कि उसका कौन सा कर्म कब फल देने को तैयार हो जाएगा!किसी अनहोनी या दुर्घटना के रूप में! केवल मात्र उनके पास ही वह सामर्थ्य होता है, जो इन कर्मों के फल को नष्ट कर सकता है! हम मनुष्य जब इस संसार में आते हैं, तो हम पर कर्म संस्कारों का भार होता है! ये कर्म हमें अपने बल से सांसारिक दुखों से बांधे रखते हैं!जैसे कभी कोई दुर्घटना, तो कभी कोई रोग! लेकिन जब हमारे जीवन में एक पूर्ण गुरु आते हैं, तो वे अपनी दिव्य कृपा हम पर करते हैं! इस कृपा का बल, कर्म -बल से विपरीत दिशा में लगता है! इसमें कर्म संस्कारों के विरुद्ध पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता होती है! यह उन्हें प्रभाव शून्य कर हमें भारहीन अनुभव कराने में पूरी तरह सक्षम होता है!कर्म संस्कारों के बंधन से छुटकारा ही वास्तविक रक्षा है! कहने का भाव कि गुरु -कृपा का बल हमें कर्म- बल से मुक्त करता है, जिससे दुखों का कारण ही नष्ट हो जाता है! इसलिए गुरु कृपा ही सबसे बड़ा रक्षा कवच है और सद्गुरु परम रक्षक!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
