सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीहम सभी जीवन समर के बीच खडे़ हैं! इसके चप्पे-चप्पे पर संघर्ष के चुनौतिपूर्ण बिगुल बज रहे हैं! इसमें विजयश्री पहले एक सफल जीवन, फिर अन्तत: मोक्ष देगी!पराजय एक असफल जीवन और अन्तत: चौरासी का बंधन! पर यह क्या? आज का मनुष्य रूपी अर्जुन तो इससे नितान्त बेखबर, अज्ञानता से बोझिल और विषादग्रस्त सा हुआ बैठा है! ओजस्वी पौरूष और आत्म बल का गांडीव उसके हाथ से फिसला हुआ है! ऐसी स्थिति में द्वापर युगीन अर्जुन के समक्ष जगदगुरु श्री कृष्ण का विराट स्वरूप प्रकट हुआ था। उसमें उसने ब्रह्मांड के हर पक्ष की झांकी देखी थी! जिससे वह उत्साहित हुआ! नव प्रेरणा और बल से संचरित! इसी के फलस्वरूप वह कुरुक्षेत्र के युद्ध में डट पाया!
अहोभाग्य वर्तमान युग के, जो इसमें भी श्री गुरु आशुतोष महाराज जी का विराट व्यक्तित्व प्रकट रूप में हमारे समक्ष विद्यमान है! आज के लाखों अर्जुनों ने उनके भव्य स्वरूप में पूर्णता के हर पक्ष की झलक देखी है!कभी वे शास्त्रों के सार सिंधु लगते हैं, तो कभी एक क्रांतिकारी युग प्रणेता! कभी सब कलाओं के सम्राट एक पूर्ण कलावंत, तो कभी समस्त ऐश्वर्यों से विरक्त- एक शाही फकीर! कभी नैतिक आदर्शों की साकार मूर्ति, तो कभी प्रेम के वशीभूत होकर प्रकृति के नियमों तक को उलट देने वाली शक्ति!कभी मानव समाज के परम मित्र, तो कभी एक युगांतरकारी संस्कृति पुरुष! और इन सबसे ऊपर- ब्रह्मज्ञान के प्रदाता- एक पूर्ण सद्गुरु!आज विश्व भर से, हम जैसे लाखों अनुयायी उनके इसी गुरु सत्ता के आकर्षण से खिंचकर उनके श्री चरणों में आए हैं! ग्रंथ कहते हैं-कि जो अन्त: स्थित सच्चिदानंद का साक्षात्कार करा दे, वही गुरु है! हे गुरुवर हमें जो आपने ब्रह्मज्ञान देकर अन्तर्जगत में परब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन कराया है!आपके लिए सहस्त्र बार नमस्कार, नमस्कार है! हे अनंत सामर्थ्य वाले भगवन! आपको सब ओर से नमस्कार है!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
