*दुख रहित सुख यानी आनंद परमात्मा को पाकर ही मिलता है।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                      श्री आर सी सिंह जी 

कलयुग में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सभी मनुष्य दुखों की अग्नि से हर पल जल रहे हैं। वास्तव में इन सभी दुखों का मुख्य कारण हमारी भौतिक कामनायें ही हैं। भोगों की बढ़ती कामनाएं इस दुख रूपी अग्नि में घी डालने का काम कर रही है। यह अग्नि बिना प्रभु भक्ति के नहीं बुझेगी, इसे आज ही स्वीकार कर लें या कल, करना तो पड़ेगा ही। वर्ना, यह जीवन यूँ ही रोते-धोते ऐसे ही चलता रहता है।

    सभी जन्मे हुए मनुष्यों में 5 विकार होते हैं। कोई विकार प्रधान होता है और कोई गौण होता है। मनुष्य योनि हमें 5 विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार समाप्त करने के लिए ही मिली है। यह विकार जो हमारी जीवन रूपी नैया को माया रूपी सागर में डुबोते रहते हैं, जिनके कारण हमारी आध्यात्मिक उन्नति हो नहीं पाती। इसीलिए मनुष्य योनि पाकर भी हम भगवान को पाने का अवसर खो देते हैं। इसलिए मनुष्य योनि पाकर हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करना अपना स्वभाव बनाना चाहिए, ताकि हमें आध्यात्म का पूर्ण लाभ मिल सके और परमात्मा से हमारी प्रीति हो। 

     भौतिक प्रकृति द्वैत है। यहाँ दिन-रात, सुख दुख, लाभ हानि, हार जीत आदि सदा बने रहते हैं। अर्थात यहां अकेला सुख कभी पैदा ही नहीं हुआ। दुख सदा सुख के साथ ही छिपा रहता है। अक्सर सुख भोगते समय मनुष्य को दुख नजर नहीं आता। दूसरी बात दुख रहित सुख यानी आनंद परमात्मा को पाकर ही मिलता है। क्योंकि परमात्मा का ही दूसरा नाम आनंद है। परमात्मा को पाने का प्रथम और सरल उपाय ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहना है, जिससे अक्सर मनुष्य बचता फिरता है।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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