*गीता का सार तत्व ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना है।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                     श्री आर सी सिंह जी 

हम सभी ने श्रीमद्भगवत गीता, जो भारतीयों के पवित्रतम ग्रंथों में से एक है, के बारे में सुना भी है और पढ़ा भी है!  हम जानते हैं कि यह गीता भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र की भूमि पर हुआ आध्यात्मिक संवाद है!लेकिन हमने उस गीता के बारे में नहीं सुना, जो इससे कुछ वर्ष पूर्व नहीं बल्कि एक युग पूर्व सुनाई गई थी! जिसके वक्ता प्रभु श्रीराम हैं और श्रोता श्री लक्ष्मण जी!  जिसे श्री राम- गीता कहा जाता है!कहते हैंं एक बार मां पार्वती ने भगवान शिव के सामने अपनी जिज्ञासा रखी, प्रभु ! अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर श्रीराम ने अपना शेष जीवन कैसेे जिया?  तब महादेव जी ने कहा उमा!एक राजा होने के नाते प्रभु श्री राम ने राज्य के प्रति अपने सभी  कर्तव्यों और दायित्वों को पूर्ण किया!  परन्तु  संपूर्ण वैभवों से संपन्न अपने राज महल में वे एक तपस्वी की तरह रहे और राजर्षियों जैसा आचरण किया!  आज तक जिन प्रभु राम को तुमने रघुकुल श्रेष्ठ, मर्यादा पुरुषोत्तम, पराक्रमी, धनुर्धर अद्वितीय वीर की भूमिका में देखा है और जो विष्णु के अवतार भी हैं,  आज उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू, जिसमें वे एक गुरु की भूमिका में, एक ज्ञानी की भूमिका में उपस्थित हुए हैं, उसे मैं तुम्हारे सामने रखता हूंँ!एक दिन प्रभु राम, जिनके  चरणों की सेवा रमा जी करती हैं, एकांत में बैठे थे!  तब वहां लक्ष्मण जी पहुंचे और प्रणाम कर अति विनीत भाव से बोले- हे महामते!आप शुद्ध ज्ञान स्वरूप, सबके हृदय में वास करने वाली आत्मा हैं, सबके स्वामी हैं, निराकार ब्रह्म स्वरूप हैं!  जो कोई भी भक्ति भाव से आपके चरण कमलों में झुकता है, वही आपके वास्तविक स्वरूप का दर्शन ज्ञान दृष्टि से कर पाता है!  प्रभु, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मैं सुगमता से अज्ञान रूपी अपार समुंदर के पार हो  जाऊं!  लक्ष्मण जी के इस कथन से स्पष्ट है कि वे जगत जननी सीता के परित्याग की घटना के बाद बहुत व्याकुल थे! वैसे तो लक्ष्मण जी स्वयं ज्ञानवान हैं, शेषनाग के अंशावतार हैं, परंतु फिर भी प्रभु की लीला के पीछे निहित कारण को वे जान नहीं पा रहे थे! अपने इसी अज्ञान को दूर करने के लिए वे प्रभु राम से प्रार्थना करते हैं!  तब भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण को ज्ञानोपदेश देते हैं, जिससे उनका अज्ञान, मोह, और दुख दूर हो सके!  प्रभु श्री राम कहते हैं इस संसार में सभी दुखों का मूल कारण अज्ञान ही है! और इसका नाश ज्ञान की तलवार से ही किया जा सकता है! इसलिए हे लक्ष्मण! बुद्धिमान को ज्ञान विचार में ही तत्पर होना चाहिए!इसलिए तुम मेरे वास्तविक स्वरूप का ही ध्यान करो!  जो निरंतर ध्यान का अभ्यास करता है वह अपने समस्त शत्रुओं (काम, क्रोध, भय, मोह आदि )को परास्त कर निरंतर मेरा ही दर्शन प्राप्त करता है!  प्रभु श्रीराम द्वारा व्यक्त इस गीता का सार तत्व भी वही है-  ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना!  अर्थात एक पूर्ण गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर ध्यान साधना करना!

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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