*भक्ति ही मनुष्य योनि में एक शुद्ध कमाई है।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                     श्री आर सी सिंह जी 

परमात्मा का ज्ञान यानी आध्यात्मिक ज्ञान किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान द्वारा ही प्राप्त होता है और सदा ही सम्माननीय व पूजनीय होता है। दूसरी बात ज्ञान प्राप्त करते समय, यदि ज्ञान समझ में नहीं आये, तो अपनी तर्क-बुद्धि से भले ही प्रश्न करें, लेकिन  प्रश्न पूछते समय कभी भी कुतर्क नहीं करना चाहिए। क्योंकि गूढ़ ज्ञान समझाते समय धार्मिक पुस्तकों में दिया गया कोई भी उदाहरण समझाने मात्र का एक तरीका होता है, ताकि ज्ञान का मूल भाव समझ में आ जाए। 

     भौतिक प्रकृति के सभी जीव अपने स्थूल शरीर द्वारा शरीर की पूर्ति के लिए कर्म करते रहते हैं, इसीलिए उनका शरीर स्वस्थ रहता है। अतः मनुष्य को भी शरीर स्वस्थ रखने के लिए कर्म यानी अपने स्थूल शरीर को हिलाते रहना चाहिए। दूसरी ओर मन को सत्संग में टिकाने से मन स्वस्थ रहता है, जिससे हमारा भविष्य उज्जवल बनता है। लेकिन अफसोस की बात है कि मनुष्य दोनों ही कामों से अपने तन और मन को चुराता है। इसीलिए उसके तन और मन दोनों ही अस्वस्थ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप जीवन में दुख अधिक बने रहते हैं।

      अक्सर ऐसा देखा गया है कि साधारण मनुष्य अपने जीवन में मरते दम तक सुख पाने के उद्देश्य से सकाम भाव से ही कर्म और विकर्म करता रहता है। जिसमें विकर्मो का फल भोगने के लिए मनुष्य से नीचे की योनियो में जन्म लेना पड़ता है। मनुष्य योनि में ही निष्काम भाव से कर्म करने का अधिकार है, जिनके शुरू होने से ही आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है। और परमात्मा ज्ञान विज्ञान तत्वरूप से समझ आने से भगवान की भक्ति आरंभ होती है। भक्ति ही मनुष्य योनि में एक शुद्ध कमाई है।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

Post a Comment

Previous Post Next Post