सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीभीषण गर्मियों के दिन थे!सूरज मानो आग उगल रहा था! इन दिनों दक्षिण भारत के श्रृंगेरी में आदि गुरु शंकराचार्य जी ने हैरान कर देने वाला एक दृश्य देखा! दो मेंढक एक पत्थर पर बैठे थे! तेज धूप के कारण वह पत्थर काफी गर्म हो गया! बुरी तरह तपने लगा! दोंनों मेंढक उस पत्थर को छोड़कर जाने ही वाले थे कि अचानक एक बहुत बड़ा विषैला सांप ठीक उनके पीछे आकर बैठ गया! आश्चर्य की बात थी कि उस विषधर ने उन मेंढको पर धावा बोलने की बजाय अपने फन को छतरी बनाया और उनको छाया देने लगा! दोनों मेंढक काफी समय तक उस छांव का आंनद लेते रहे! फिर कूदते-फुदकते वहां से चले गये! मेंढकों के चले जाने पर सांप ने भी अपना फन समेटा और अपने बिल में चला गया! आदि गुरु शंकराचार्य जी ने जब यह दृश्य देखा, तो कुछ देर तक उस स्थान के विषय में सोचते रहे! उन्हें यह अनुमान लगाते देर न लगी कि निश्चय ही इस जगह पर श्रेष्ठ तरंगों का प्रवाह है! क्योंकि तभी ऐसा संभव है कि एक विषैला सांप भी अपनी हिंसक प्रवृति को छोड़कर प्रेम और सौहार्द जैसे सद्गुणों को धारण कर ले! जब उन्होंने पता लगाया तो उन्हें मालूम हुआ कि उस पत्थर पर बैठकर एक ब्रह्मज्ञानी ऋषि ने बहुत लंबे समय तक साधना की थी!शंकराचार्य जी कहते है कि ऐसा ही होता है, सद्गुणों का प्रभाव! इनके सम्पर्क में आने वाला जीवन इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता! जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा सोने में बदल जाता है, वैसे ही सद्गुणों की श्रेष्ठ तरंगों के स्पर्श से दुष्प्रवृतियां धूमिल पड़ जाती हैं।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
