सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीप्रकृति के 84 लाख योनियों में असंख्य जीव हैं। इन सभी जीवों से परमात्मा बिना किसी भी भेदभाव से असीम प्रेम करते हैं। जैसे सागर के पास कभी भी जल की कमी नहीं होती। हम जितना बड़ा भी घड़ा ले जाएं, सागर जल देने से कभी भी मना नहीं करता। उसी तरह परमात्मा की दया/कृपा रुपी वर्षा सभी जीवों पर सदा ही होती है। लेकिन यह कृपा पात्रता रूपी बर्तन में ठहरती है। यह पात्रता यानी योग्यता हम केवल मनुष्य योनि में ही बना सकते हैं।
भौतिक जगत में रहने वाले सभी मनुष्य जन्म और मृत्यु से अच्छी तरह परिचित हैं। किसी के जन्म के समय सामान्य रूप से राग बना रहता है। लेकिन यही राग श्मशानघाट में जलते हुए मनुष्य को देखकर वैराग्य में बदल जाता है, जोकि अस्थाई रूप में होता है। जबकि स्थाई वैराग्य जितने अंश में मन में जगता है उतने ही सत्संग में लिया हुआ ज्ञान मन में टिकता है। फिर यही टिका हुआ ज्ञान ही मन को भक्ति में लगाता है। हम सभी मनुष्य अपने अपने जीवन में जिसका भी संग करते हैं, उसका रंग सहज ही हमारे ऊपर आने लगता है। जैसे सूर्य के पास बैठने मात्र से प्रकाश सहज ही मिल जाता है। उसी तरह संतों का संग यानी सत्संग करने से भगवान का ज्ञान मिलने लगता है। दूसरी ओर कुसंग करते ही उसका प्रभाव तो तुरंत पड़ता ही है, साथ में पहले का मिला हुआ ज्ञान भी मिटने लगता है। अतः हमें अपने जीवन में बुरे लोगों की परछाईं से भी सदा दूर रहना चाहिए।
भौतिक प्रकृति में रहने वाले सभी जीवों के पास एक मन अवश्य होता है, भले ही स्थूल शरीर में किसी अंग विशेष की अपंगता हो सकती है। वास्तव में यह मन ही वह चाबी है, जो सत्संग में लगने से एक दिन परमात्मा की प्राप्ति करवा देता है। और कुसंग में लगने से यही मन संसार /माया में फंसा देता है। मनुष्य अपने जीवन में सत्संग के अतिरिक्त जो कुछ भी करता है, उसे मोटे तौर पर कुसंग ही मानें। भौतिक प्रकृति यानी सतो + रजो+ तमोगुण की सम अवस्था। भौतिक प्रकृति में तीनों गुणों की प्रधानता वाले जीव रहते हैं। एक साधारण मनुष्य स्वभाव से तो रजोगुणी माना जाता है। वास्तव में मनुष्य जीवन अपना सतोगुण बढ़ाने के लिए व विशुद्ध सतोगुण यानी भगवान को पाने के लिए ही मिला है। इसलिए प्रकृति के सतोगुणी समय का तो अवश्य ही संग करना चाहिए। अर्थात सूरज निकलने से 2 घंटे 40 मिनट पूर्व का समय यानी ब्रह्ममुहूर्त में अवश्य ही उठ कर ध्यान साधना करना चाहिए।
शास्त्रों में शब्दों का साधारण ज्ञान तो गुरु से सुनने व पढ़ने से हो जाता है। लेकिन इन शब्दों पर बार बार मनन करते रहने से ही इन शब्दों के गहरे अर्थ समझ में आ पाते हैं। अन्यथा सुने हुए शब्द अक्सर हमारे दिमाग से ही उड़ जाते हैं और हमारे जीवन में कोई सुधार देखने में नहीं आता। अतः हमें किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते हुए ही शास्त्रों /ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। तभी हमारी दिनचर्या या कर्मों में सुधार हो सकता है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम*
"श्री रमेश जी"
