सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
अंतरिक्ष में पृथ्वी के घूमने के कारण वर्ष भर में सूर्य आधा समय उत्तर पूर्व की ओर और आधा समय दक्षिण पूर्व की तरफ जाता आता दिखाई देता है। सूर्य सिद्धांत के अनुसार 14जनवरी से 16जुलाई के बीच का समय "उत्तरायण" काल कहलाता है। और इसी का पूरक अगले 6 माह "दक्षिणायन" काल कहलाता है। खगोलीय तथ्य के अनुसार साल के आधे महीनों में (मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक) मृत होने वाले लोग अपने आप सद्गति को प्राप्त होते हैं। वहीं साल के अगले 6 महीनों (कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक) में मरने वाले अधोगति को प्राप्त होते हैं।
परंतु क्या मृत्यु और गति के बीच में इतना स्थूल सम्बंध हो सकता है? इसलिए हमें इसे शास्त्रीय दृष्टि से भी समझना होगा। प्रश्नोपनिषद (1/9) में ऋषि कहते हैं-- संवत्सर के दो भाग हैं। छह मास तक सूर्य दक्षिण दिशा की तरफ जाता है। इस काल को दक्षिणायन कहते हैं। छह मास तक वह उत्तर दिशा की ओर जाता है। इस समय को उत्तरायण कहते हैं।
जो सकाम भाव से कर्म करते हैं, फल लाभ की इच्छा रखते हैं, सांसारिक भोगों को स्थान देते हैं-- ऐसे लोग जन्म मरण के चक्र में फंसे रहते हैं। इनका मार्ग दक्षिणायन है। इसमें भोग वृत्तियां प्रबल होती हैं। पुत्र, पौत्रों की कामना और मोह जोर मारता है। इसलिए यह मार्ग "पितृयान" मार्ग कहलाता है। इसके विपरीत जब सूर्य उत्तर की ओर प्रस्थान करता है, तब मनुष्य में त्याग व निवृत्ति भाव उमड़ने लगता है। इसे उत्तरायण या "देवयान" मार्ग भी कहते हैं।
गीता के आठवें अध्याय में श्लोक 23-26 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं-- "अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष तथा 6 मास वाला उत्तरायण में मृत्यु के बाद जब योगीजन बढ़ते हैं तो वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।और धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष तथा 6 माह वाला दक्षिणायन-- इनसे युक्त मार्ग पर जब मृत्योपरांत मनुष्य जन बढ़ते हैं तो वे स्वर्ग सुख भोगकर वापिस पृथ्वी पर लौट आते हैं।
इन शास्त्रीय विवेचनाओं से स्पष्ट सिद्ध होता है कि बात सिर्फ उत्तरायण और दक्षिणायन काल की ही नहीं, "मार्ग" की भी है।मनुष्य की "मनोवृत्ति और साधना प्रकार" की भी है। महापुरुषों ने "कर्मकांड मार्ग" की तुलना में "ज्ञानमार्ग" को श्रेष्ठ बताया है। बाह्य नहीं, अंतर्जगत की साधना को उत्तम घोषित किया है।
इस सृष्टि का एक अद्भुत रहस्य है-- "जो ब्रह्माण्डे सोई पिण्डे"। अर्थात जो खगोलीय क्रम बाहरी ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे शरीर के भीतर अंतर्जगत में भी है। हृदय से हमारे सिर की ओर का भाग उत्तर और पांव की ओर का भाग दक्षिण को सम्बोधित करता है। योगिक भाषा मे "अनाहत चक्र" से उपर सहस्रार चक्र तक का भाग उत्तरायण पथ कहलाता है।इसके विपरीत अनाहत चक्र से नीचे "मूलाधार चक्र"तक का भाग दक्षिणायन पथ कहलाता है।
उपनिषदों में ब्रह्मरंध्र (सहस्रार चक्र) को ब्रह्मलोक कहा गया है।इसके शीर्ष पर एक छोटा सा कमल है जो हृदयरूपी मंदिर कहलाता है। इस हृदय मंदिर में सूक्ष्म हृदयाकाश है। इस हृदयाकाश के भीतर जो ब्रह्म छिपा है, उसे खोजना चाहिए, जानना चाहिए। हमें यह भी जानना चाहिए कि यह "निम्न" से "उच्च" स्तर पर कैसे जाया जाता है? "दक्षिणायन" से "उत्तरायण" पथ पर प्राणों को कैसे आरोहित करते हैं?
केवल एक पूर्ण गुरु और उनके द्वारा प्रदत्त पूर्ण ब्रह्मज्ञान ही हमें दक्षिणायन से उत्तरायण पथ का गामी बनाता है। हमें पितृयान मार्ग के मोह आदि विकारों से निकालकर दिव्य देवयान मार्ग का राही बना देता है।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
