सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
इस संसार की सबसे आश्चर्यचकित करनेवाली बात यह है कि मनुष्य अनेक व्यक्तियों की मृत्यु देखता है, परंतु तब भी यही सोचता है और इसी प्रकार जीवन जीता है कि वह हमेशा ही जीवित रहेगा।
मृत्यु निश्चित है और जीवन अनिश्चित है। परंतु तब भी मनुष्य अपना अमूल्य समय ऐसी वस्तुओं को सहेजने में व्यर्थ कर रहा है, जो मृत्योपरान्त वह अपने साथ लेकर नहीं जाएगा। युधिष्ठिर महाराज कहते हैं-- "महाजनों येन गत: स पंथा" संतों महापुरुषों के पदचिन्हों का अनुसरण करना ही सबसे उत्तम मार्ग है।
जिस प्रकार एक नाविक महासागर पार करते समय अपने साथ दिशा निरूपण यंत्र (कम्पास) रखता है, उसी प्रकार हमारे संतों महापुरुषों द्वारा प्रदर्शित मार्ग हमारी इस जीवन रूपी यात्रा के लिए वास्तविक दिशा निरूपण यंत्र है। जिस प्रकार नाविक दिशा निरूपण यंत्र पर विश्वास करता है, उसी प्रकार जिज्ञासु को भी अपने सदगुरु पर पूर्णतः विश्वास कर अपने जीवन रूपी जहाज को चलाना चाहिए ताकि वह अपने लक्ष्य तक पहुंच जाए। यदि वह अपने सदगुरु पर संशय कर अपना एक नया मार्ग बनाने का प्रयास करता है तो अधर मे ही लटक जाएगा। उसकी स्थिति ठीक त्रिशंकु के समान हो जाएगी, जो न स्वर्ग में पहुंच पाया और न ही धरा पर वापिस लौट पाया।
युधिष्ठिर महाराज कहते हैं-- उस परम सत्ता ईश्वर का ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है। पूर्ण गुरु इसी ब्रह्मज्ञान के मेघ बरसाने हेतु धरती पर अवतरित होते हैं। इस विद्या से हम मानव शरीर में ही ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं। यही वह विद्या है, जिसका प्रतिदिन अभ्यास करने से हम अपने मन को साध सकते हैं। यही मन को हमारा सच्चा मित्र बना देती है। इस विद्या की प्राप्ति के बाद ही हम भौतिक पदार्थों में उलझे बिना, उनका प्रयोग सफल जीवन यापन के लिए कर पाते हैं।
परंतु हमारा दुर्भाग्य कि हम सोचते हैं कि हम मृत्यु का ग्रास नहीं बनेंगे। तभी तो जीवन में ज्ञान प्राप्ति के लिए विलम्ब करते हैं। हमारी प्राथमिकता सूची में ईश्वर की मांग करना या तो सबसे अंतिम स्थान पर आता है या फिर आता ही नहीं है।
अत: हमें सच्ची निष्कपट प्रार्थना करनी चाहिए कि "हे ईश्वर, मुझे आप और केवल आप ही चाहिए। मुझे किसी ऐसे सदगुरु की शरणागत करें जो मुझे ब्रह्मज्ञान देकर आपसे मिलने का मार्ग प्रदान कर सकें।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
