सोचता हूं

 


भगवान् श्रीकृष्ण ने पांडव अर्जुन से कहा –.अर्जुन! कान,आंंख आदि पांच ज्ञानेंद्रियों तथा उनके शब्द,रुप आदि पांच विषयों में केवल दो चीजें ही होती है –

१-यदि अपने मन के लायक है तो उसमें राग(लगाव,खिंचाव,पाने की इच्छा) उत्पन्न हो जाता है।

२-यदि अपने मन के लायक नहीं है तो उसमें द्वेष(घृणा,दुराव,अपकर्षण) उत्पन्न हो जाता है। अतः मनुष्य को इन राग तथा द्वेष के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही मनुष्य का  पतन करने वाले बहुत बड़े शत्रु हैं। अर्जुन! अच्छी तरह आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुणहीन भी अपना धर्म अति उत्तम है।अपने धर्म में तो मरना भी हितकर है तथा 

दूसरे का धर्म भयानक होता है –

इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थेरागद्वेषौव्यवस्थितौ।

तयोर्नवशमागच्छेत्तौह्यस्यपरिपंथिनौ।।

श्रेयान्स्वधर्मोविगुण:परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मेनिधनंश्रेय:परधर्मोभयावह:।।

—३.३४-३५ श्रीमद् भगवत गीता 

                प्रस्तुतकर्ता 

       डां०हनुमानप्रसादचौबे

                  गोरखपुर।

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