सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
बहुत सालों पहले की बात है।एक बार गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी के पास कुछ धार्मिक लोग आए। उन्होंनेे महाराज जी से लंबी धर्म चर्चा की। इसी दौरान उन्होंने महाराज जी से कहा- महाराज जी, हमारे मुनि जी भी आपसे मिलने आना चाहते थे। पर वे आज नहीं आ पाए। महाराज जी ने कहा- क्यों नहीं आ पाए?
उन लोगों ने कहा- क्योंकि आजकल उन्होंने मौन व्रत धारण किया हुआ है। इसलिए वे किसी से मिल नहीं रहे। ऐसा कहकर उन्होंने मौन व्रत की बड़ी महिमा गाई। उनकी बातें सुनकर श्री महाराज जी बोले- ठीक कहा आपने। मौन श्रेष्ठ तप है।परंतु फिर अगले ही पल श्री गुरु महाराज जी ने सहजता से कहा- हम भी सदा मौन में रहते हैं। यह सुनते ही वे सब हैरान रह गए और एक दूसरे की ओर देखने लगे। क्योंकि यह बात श्री महाराज जी ने तब कही थी, जब वे उन लोगों को पिछ्ले एक-डेढ़ घंटे से सत्संग सुना रहे थे। उन लोगों ने प्रश्नवाचक दृष्टि से गुरुदेव की ओर देखा। मानो पूछना चाह रहे हो भला यह कैसा मौन हैं? श्री महाराज जी उनकी मानसिक स्थिति समझ गए। हंसते हुए गुरुदेव ने उन्हें समझाया- जानते हो, मौन कहते किसे हैं? मन: मृत्यु मौंन- मन की मृत्य हो जाना ही मौन है। मुख का चुप हो जाना मौन नहीं है। जहां मन का शोर शांत हो जाए, मन स्थिर हो जाए वो मौन है। श्री महाराज जी ने कहा- ब्रह्मज्ञान की साधना का अभ्यास करते-करते एक स्थिति ऐसी हो जाती है, जब संसार उधर से अपने संवेग भेजता है, पर इधर से मन प्रतिक्रिया नहीं करता। चुप रहकर साक्षी बन जाता है। संसार चाहे कोई भी अफवाह फैलाए, तब भी हमारे जीवन में संशयो का, उलझनों का शोर नहीं होता। हमारा मन माया के खेल में भाग लेना छोड़ देता है। इसी को कहते है- मन की मौन स्थिति। इसलिए जरूरी है कि हम भी इसी मौन स्थिति को धारण करना सीखें। और ये केवल ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना से ही होगा!
साभार,'अखंड ज्ञान'
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
