सोचता हूं।

 

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा–पार्थ!

देखो,यद्यपिमुझे इनतीनोंलोकों में नतोकुछकर्तव्यहैतथान कोई भीपानेयोग्यचीज अप्राप्त है,फिर भी मैं कर्म करता हूं।यदि कदाचित्

मैं कर्मन करूं तो लोग भी कर्मनकरें

क्यों कि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग

का अनुसरण करते हैं। इसीलिए यदि मैं

कर्म न करूं तो ये सब मनुष्य नष्ट -भ्रष्ट

होजायं और मैं संकरताका कारणबनूंतथा

इस समस्त प्रजाकोनष्ट करने वाला बनूं।

अर्जुन!जैसे अज्ञानी लोग आसक्ति पूर्वक

मनसे कर्मकरतेहैं वैसे ही ज्ञानीजनविना

आसक्ति मनसे लोकहितार्थ कर्म करें।

भगवान् के स्वरूप में स्थित हुएज्ञानीजन को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मोंको स्वयं करें और आसक्ति वाले पुरुषों कोउसी प्रकार करने केलिए प्रेरित करें।कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करें –

न बुद्धिभेदंजनयेदज्ञानांकर्मसंगिनाम्।

जोषयेत्सर्वकर्माणिविद्वान्युक्त:समाचरन्।।

    श्रीमद्भगवत गीता३.२६

     डां.हनुमान प्रसाद चौबे 

          गोरखपुर।

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