सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
राम चरित मानस में कहा गया है---
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।।
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी।
ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।
मानव तन के तुल्य कोई भी तन नहीं है। चराचर जगत के सम्पूर्ण जीव इस तन की याचना करते हैं।क्योंकि मानव शरीर ही एक ऐसा शरीर है, जिसमें आकर जीव नरक, स्वर्ग व मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह शरीर ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देनेवाला है।और किसी भी योनि में इनकी प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि बांकि सभी योनियों में जीव मात्र अपना प्रारब्ध ही भोग सकता है, कोई नया कर्म नहीं कर सकता।
हानि कि जग एहि सम किछु भाई।
भजिअ न रामहि नर तनु पाई।।(रा.च.मा.)
मनुष्य तन को प्राप्त करके भी भक्ति को न जानना, संसार में इससे बड़ी हानि की कोई बात नहीं है।
मानव तन विषय भोगों के लिए नहीं मिला है। विषय वासनाओं का सुख कुछ समय के लिए स्वर्गीय सुख के समान लगता है, फिर दुखों का हेतु बन जाता है।जैसे किसी के शरीर पर खुजली हो जाए तो उसे बार बार खुजलाना बहुत अच्छा लगता है। परन्तु जब वह इंसान बार बार ऐसा करता है तो उस स्थान पर घाव हो जाता है, जिससे फिर बहुत कष्ट होता है।भ्रमवश मनुष्य सोचता है कि मैं विषयों का भोग कर रहा हूँ, किंतु अंत में पता चलता है कि विषयों ने ही मनुष्य को भोग लिया है।
धन से मानव कभी भी तृप्त नहीं हो सकता। जिस तरह आग में घी डालने से आग और तेज होती है। उसी तरह से धन और भोगों की प्राप्ति के साथ साथ भोगने की इच्छा और प्रबल होती है।
एक बार की बात है- कुछ धनवान लोग एक महापुरुष के पास जाते थे और सांसारिक वस्तुओं की मांग करते थे। वे संत जो भी बोल देते थे, वह पूरा हो जाता था। एक दिन महात्मा ने सोचा कि ये लोग सांसारिक पदार्थों को इकट्ठा करने में जीवन नष्ट कर रहे हैं, इन्हें कुछ समझाना चाहिए। संत ने उनलोगों से कहा कि आपलोग प्रभु से सीधी बात क्यों नहीं कर लेते। उनलोगों ने कहा हम प्रभु से बात करना नहीं जानते हैं, आप सिखा दीजिये। संत ने कहा ठीक है, मैं जैसा बोलता हूँ, आप भी मेरे पीछे बोलिए।
महात्मा जी बोलना शुरू किए-- हे प्रभु आप कृपा करके हमारी समस्याओं को समाप्त करदें। आप तो जानते हैं कि हमें कितनी चिंताएं हैं। आप कृपा कर कभी भी मनुष्य शरीर न देना बल्कि हमें कुत्ते, बिल्ली, गदहे इत्यादि योनि मे भेज देना।
सभी लोग चौंककर कहने लगे- महाराज आप यह क्या कह रहे हैं?
संत ने कहा- आप केवल भोग ही तो भोगना चाहते हैं, और ये भोग तो आप किसी भी योनि में भोग सकते हैं। उन योनियों में आपको कोई चिंता नहीं सताएगी।
सभी लोग संत के चरणों में गिर पड़े। कहने लगे हम रास्ता भटक गए थे।
तब संत बोले- मनुष्य शरीर प्रभु से नश्वर वस्तुओं को मांगने के लिए नहीं, अपितु प्रभु से प्रेम कर उनको प्राप्त करने के लिए मिला है।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
