सोचता हूं ।

    

       महर्षि वेदव्यास के पुत्र श्री शुकदेव जी ने-

गंगा तट पर स्थित अनेक ख्यात ऋृषि मुनियों से घिरे मुमुक्षु हस्तिनापुर नरेश परीक्षित से कहा –राजन्! जो ब्रह्म तेज

चाहताहै वह बृहस्पति की उपासना करे।

जो इंद्रियों की विशेष शक्ति चाहता है वह

इंद्रकी,जो संतान चाहताहैवहप्रजापतियों

की, जो लक्ष्मी चाहता है वह मायादेवी की, जिसे तेज चाहिए वह अग्नि की,जो

धन चाहता है वहवसुओंकी, जो प्रभुत्व 

चाहता है वह रुद्रों की, जो काफी अन्न

चाहता है वह अदिति की,जिसे स्वर्ग की

कामना होवह देवताओंकी, जो राज्यकी 

अभिलाषा रखता है वह विश्व देवोंकीतथा

जो प्रजा को अपने अनुकूल रखनाचाहता

हैवहसाध्यदेवताओं की उपासना करे।‌जो

बुद्धिमान्मनुष्य है–वहचाहेकामनारहित

हो या समस्त कामनाओं से युक्त हो अथवा मुमुक्षु हो–उसेतोतीव्रभक्तियोग

के द्वारा केवल श्रीकृष्ण कीहीउपासना

करनी चाहिए।–द्वितीयस्कंध,

अ०३,श्लोक१-१२, श्रीमद्भागवत महापुराण 

               प्रस्तुतकर्ता 

         डां०हनुमानप्रसादचौबे

                   गोरखपुर 



।,            

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