सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री मद्भागवत पुराण में एक कथा आती है। श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित को कहते हैं कि त्रिकुट पर्वत पर गजेंद्र नाम का एक शक्तिशाली गज (हाथी) था। एक बार गर्मी के दिनों में वह अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ सरोवर में नहाने गया। जब वह जल क्रीड़ा कर रहा था तो उसी समय एक ग्राह ने उसका पाँव पकड़ लिया।उससे छूटने का गज ने बहुत प्रयास किया, किंतु ग्राह की शक्ति के आगे गज की शक्ति क्षीण पड़ गई और धीरे धीरे ग्राह गज को खीचता गया। यह देखकर हथिनियां और उसके बच्चे उसको छोड़कर चले गए।गज को अब विश्वास हो गया कि मुझे कोई नहीं बचा सकेगा। गज की सूंड का मात्र थोड़ा सा भाग ही बचा था, बाकि पूरा शरीर पानी में डूब चुका था। उसी समय उसने प्रभु को पुकारा, तब भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की।
श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित को समझाते हुए कहते हैं कि यह जीव ही गजेन्द्र है और यह संसार सरोवर का रूप है और काल ग्राह है। यह जीव ही संसार रूपी सरोवर में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ विषय भोग रूपी जल क्रीड़ा में मस्त है। कालरूपी ग्राह आकर इसे पकड़ लेता है। तब वह रोता चिल्लाता है और फिर जीव को चौरासी लाख योनियों के दु:ख भोगने पड़ते हैं।
यदि इस जीव को मनुष्य तन में आकर परमात्मा की स्मृति आ जाय तो इसको दु:खों से सदा के लिए छुटकारा मिल सकता है।उस परमात्मा के बिना इस जीव को कोईभी दु:खों से मुक्त नहीं कर सकता
*ओम् श्रीआशुतोषाय नमः*
"श्री रमेश जी"
