सोचता हूं ।

 

पांडव पौत्र हस्तिनापुर नरेश महाराज परीक्षित अभिशप्त होने के कारण राज-काज से अनासक्त होकर देवतटिनी गंगा तट पर मुक्ति हेतु महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण में ध्यानस्थ हो कर बैठ गये। वहां तत्कालीन प्रख्यात ऋषि -मुनियों से घिरे महर्षि वेदव्यास नंदन श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित से कहा –राजन्!जल,अग्नि,वायु,आकाश,अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति–इन सात आवरणों से घिरे

हुए इस ब्रह्माण्ड शरीर में जो विराट्पुरुष भगवान् हैं उन्हीं की धारणा की जाती है‌ ‌‌। तत्त्व के ज्ञाता पुरुष उस विराट्पुरुष का वर्णन इस तरह करते हैं –पातालविराट् पुरुष के तलवे हैं,उनकी एड़ियां और पंजे रसातल हैं, एड़ी के ऊपरकी गांठें महातल हैं, उनके पैर के पिंडे तलातल हैं‌।दोनों घुटने सुतल हैं, जांघें वितल तथाअतल हैं,पेडू भूतल है और परीक्षित!उनके नाभिरुप सरोवर को हीआकाश कहते हैं।उनकी छाती को स्वर्गलोक,गले को महलोक,मुखको जनलोक 

तथा ललाटकोतपोलोककहते

हैं।उनका मस्तकसमूह ही सत्यलोकहै‌। इस प्रकार यह अनंत सृष्टि उनकी माया

का कटाक्ष-विक्षेप है।

जैसे स्वप्न देखने वाला स्वप्नावस्थामें अपने

आपको ही विभिन्न पदार्थों के रुप में देखता है,वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियों

के द्वारा सब कुछ अनुभव करने वाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है। उसी का ही भजन करना चाहिए। अन्य किसी में आसक्ति करने से जीव का अध:पतन ही निश्चित है।–२स्कंंध,१अ०,२५-३९श्लोक,

श्रीमद्भागवत महापुराण 

               प्रस्तुतकर्ता 

        डां०हनुमानप्रसाद चौबे 

                 गोरखपुर।

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